“पहलगाम हमले के बाद की चुप्पी: एक रणनीति या कुछ भी नहीं?”

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जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए भीषण आतंकी हमले के बाद देश की राजधानी दिल्ली में एक अजीब सी खामोशी पसरी हुई है। केंद्र की मोदी सरकार से जिस त्वरित और सख्त कार्रवाई की उम्मीद थी, वह अब तक नजर नहीं आई है। राजनीतिक गलियारों, आम नागरिकों और विश्लेषकों के बीच एक ही सवाल घूम रहा है: क्या कोई बड़ी कार्रवाई की तैयारी हो रही है या फिर यह भी एक और कहानी बन जाएगी जिसमें आतंकवादी निर्दोषों की हत्या कर भाग जाते हैं और देश शोक में डूबा रह जाता है?

पिछले कुछ वर्षों में पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में हिंदुओं पर हुए हमलों ने देश के लोगों को झकझोर कर रख दिया है। इसके बावजूद केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया अक्सर उतनी प्रभावी नहीं रही जितनी अपेक्षित थी। हाल ही में वक्फ अधिनियम में संशोधन के बाद पश्चिम बंगाल में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान हिंदुओं पर हमले हुए, उनके घर जलाए गए और निर्दोष लोगों की जान ली गई। उस समय लोगों को उम्मीद थी कि केंद्र सरकार सख्त कदम उठाएगी, लेकिन अब तक कोई बड़ा कदम देखने को नहीं मिला।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तो सीधे-सीधे बीएसएफ पर ही गंभीर आरोप लगा दिए। उन्होंने दावा किया कि बीएसएफ ने सीमा पार से अपराधियों को बंगाल में घुसाया और बाद में उन्हें वापस भेज दिया। यह आरोप न केवल केंद्र सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है, बल्कि भारत की आंतरिक सुरक्षा को भी चुनौती देता है। ऐसे गंभीर आरोप के बावजूद केंद्र की चुप्पी ने आम जनता को असमंजस में डाल दिया है।

वक्फ अधिनियम में संशोधन का मामला अब सुप्रीम कोर्ट में है, लेकिन इस दौरान हिंदुओं पर हो रहे हमलों पर केंद्र सरकार की निष्क्रियता ने सवाल खड़े कर दिए हैं। अब यह सवाल और भी बड़ा हो गया है कि आखिर केंद्र सरकार कब वह सख्त कदम उठाएगी जिसकी देश के नागरिकों को लंबे समय से उम्मीद है।

यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का तीसरा कार्यकाल है और यह कार्यकाल उनके लिए ऐतिहासिक बन सकता है। यह समय है जब उन्हें केवल भाषणों से नहीं, बल्कि ठोस और साहसी कदमों से यह साबित करना होगा कि वह एक मजबूत नेता हैं, जो देश की सुरक्षा और नागरिकों के सम्मान के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। देश के लोग आज पीएम मोदी से केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई चाहते हैं।

पहललगाम के ताजा जख्म अभी हरे हैं और बंगाल में हिंदुओं के खिलाफ जारी हिंसा को भी गंभीरता से लेना जरूरी है। यदि केंद्र सरकार वास्तव में राष्ट्र की रक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता साबित करना चाहती है, तो उसे बिना देरी के निर्णायक कदम उठाने होंगे। यह वक्त है जब प्रधानमंत्री मोदी को एक सिंह की तरह गरजते हुए देश को दिखाना चाहिए कि भारत अब आतंक, अराजकता और विभाजनकारी ताकतों को बर्दाश्त नहीं करेगा।

दिल्ली की यह चुप्पी ज्यादा दिन नहीं चलेगी। या तो इतिहास रचने वाली कोई बड़ी कार्रवाई की तैयारी चल रही है, या फिर एक और मौका खो जाएगा। यह समय है जब प्रधानमंत्री मोदी यह साबित कर सकते हैं कि वह आज भी देश को मजबूती से नेतृत्व देने वाले नेता हैं।

देश देख रहा है, सुन रहा है और उम्मीद कर रहा है। जो फैसला आज लिया जाएगा, वही प्रधानमंत्री मोदी की विरासत को तय करेगा। आने वाली पीढ़ियां उन्हें एक मजबूत नेता के तौर पर याद करेंगी या फिर एक ऐसे वक्ता के तौर पर जो सिर्फ बातें करता रहा—यह तय करने का वक्त अब आ गया है।

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