बदलती विश्व व्यवस्था की आहट: ईरान के साथ युद्ध अमेरिका के लिए कितना भारी पड़ सकता है

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अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा मौजूदा संघर्ष अब केवल दो देशों की लड़ाई नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक राजनीति की दिशा बदलने वाला मोड़ बन सकता है। शुरुआती संकेत बताते हैं कि ट्रम्प प्रशासन ने ईरान की सैन्य क्षमता और उसकी जवाबी रणनीति को कम आंका। जिस कार्रवाई को अमेरिका ने सीमित और तेज़ ऑपरेशन के रूप में पेश किया था, वह अब कई मोर्चों पर फैलती दिखाई दे रही है। ईरान ने जिस तरह से जवाबी हमले किए हैं, उसने खाड़ी देशों और इज़राइल की सुरक्षा को लेकर बनी वर्षों पुरानी धारणा को झटका दिया है। क्षेत्रीय रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि इज़राइल के शीर्ष नेतृत्व से जुड़े ठिकानों को निशाना बनाने की कोशिश की गई। हालांकि इन खबरों की स्वतंत्र पुष्टि सीमित है, लेकिन इतना साफ है कि ईरान अब प्रतीकात्मक जवाब से आगे बढ़कर रणनीतिक और नेतृत्व-स्तर के लक्ष्यों को निशाना बना रहा है।

इस बार की लड़ाई पहले के फिलिस्तीनी संघर्षों से अलग दिख रही है। ईरान बहु-स्तरीय और बहु-लक्ष्य हमले करने की क्षमता दिखा रहा है। इज़राइल और खाड़ी क्षेत्र से जुड़ी जगहों पर हुए हमलों में जानमाल का नुकसान हुआ है, जिनमें सैन्य कर्मियों की मौत की भी खबरें हैं। कुवैत में अमेरिकी एफ-16 विमानों के दुर्घटनाग्रस्त होने की घटनाओं ने भी हालात को और गंभीर बना दिया है। इन घटनाओं के कारणों पर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि युद्ध का दायरा बढ़ रहा है और जोखिम भी बढ़ते जा रहे हैं। अमेरिकी सैन्य अधिकारियों ने साफ कहा है कि यह एक रात का ऑपरेशन नहीं था और आने वाले हफ्तों में और नुकसान की आशंका है। स्वयं राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने संकेत दिया है कि यह लड़ाई कई हफ्तों तक चल सकती है।

लंबा खिंचता युद्ध अमेरिका के भीतर भी राजनीतिक सवाल खड़े कर रहा है। पिछले वर्षों में हुए सर्वे बताते हैं कि अमेरिकी जनता का बड़ा हिस्सा मध्य-पूर्व में एक और लंबे युद्ध के पक्ष में नहीं है। इराक युद्ध के अनुभव ने लोगों को सतर्क बना दिया है, जहां हथियारों के मुद्दे पर बाद में गंभीर विवाद खड़े हुए थे। ऐसे में अगर यह संघर्ष बढ़ता है, तो घरेलू स्तर पर ट्रम्प प्रशासन को आलोचना का सामना करना पड़ सकता है।

ईरान की रणनीति केवल सैन्य जवाब तक सीमित नहीं दिखती। यदि उसके सर्वोच्च नेता की हत्या की पुष्टि होती है, तो इसे ईरान अपने अस्तित्व पर हमले के रूप में पेश करेगा। ईरान लंबे समय से खुद को एक “सर्वाइवल स्टेट” के रूप में ढाल चुका है, जहां सत्ता संरचना केवल एक व्यक्ति पर निर्भर नहीं रहती, बल्कि सैन्य, धार्मिक और राजनीतिक संस्थाओं का एक जटिल नेटवर्क काम करता है। ऐसे में शीर्ष नेतृत्व को हटाना हमेशा रणनीतिक जीत में नहीं बदलता; कई बार यह आंतरिक एकता और प्रतिरोध को और मजबूत कर देता है।

इस संघर्ष पर रूस और चीन की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अमेरिकी-इज़राइली कार्रवाई की आलोचना करते हुए मध्यस्थता की पेशकश की है। चीन ने भी हमलों को अस्वीकार्य बताया है। इन बयानों से संकेत मिलता है कि वैश्विक स्तर पर नए राजनीतिक समीकरण बन सकते हैं। यदि यह टकराव लंबा चला, तो कई देश अमेरिका की नीतियों से दूरी बनाकर रूस और चीन के साथ अधिक नजदीकी बढ़ा सकते हैं। इससे एक स्पष्ट बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था उभर सकती है, जहां शक्ति संतुलन बदलता दिखाई देगा।

क्षेत्रीय स्तर पर भी हालात जटिल होते जा रहे हैं। लेबनान में हिज़्बुल्लाह के साथ तनाव और संभावित उत्तरी मोर्चे के खुलने की आशंका ने युद्ध के दायरे को और बढ़ा दिया है। खाड़ी देशों, जो दशकों से अमेरिकी सुरक्षा पर निर्भर रहे हैं, अब खुद को अधिक असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार मार्ग और निवेश का माहौल—सब कुछ इस संघर्ष की दिशा पर निर्भर करता है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अमेरिका इस अभियान से स्पष्ट राजनीतिक लक्ष्य हासिल कर पाएगा, या यह एक लंबा और महंगा संघर्ष बन जाएगा। यदि ईरान संतुलित लेकिन तीखे जवाब देता रहा और इसे अपनी संप्रभुता की रक्षा की लड़ाई के रूप में प्रस्तुत करता रहा, तो अमेरिका के लिए “साफ जीत” हासिल करना कठिन हो सकता है। ऐसे हालात में यह युद्ध केवल क्षेत्रीय टकराव नहीं रहेगा, बल्कि नई वैश्विक ध्रुवीकरण प्रक्रिया की शुरुआत बन सकता है। आने वाले समय में यह तय होगा कि यह संघर्ष सीमित रहता है या विश्व राजनीति के नए अध्याय की नींव रखता है।

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