पश्चिम बंगाल चुनावी बहस में ‘खान-पान’ का मुद्दा गरमाया, अनुराग ठाकुर ने दी प्रतिक्रिया और ममता सरकार पर साधा निशाना

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पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावी माहौल के बीच इस बार राजनीतिक बहस का एक नया केंद्र ‘खान-पान की स्वतंत्रता’ बन गया है। मछली खाने को लेकर उठे सवालों पर भारतीय जनता पार्टी के सांसद अनुराग ठाकुर ने प्रतिक्रिया देते हुए स्पष्ट किया कि देश में कहीं भी लोगों के खान-पान, विचार या धर्म का पालन करने पर कोई प्रतिबंध नहीं है।

एक समाचार चैनल से बातचीत के दौरान अनुराग ठाकुर ने कहा कि वह पिछले दो दशकों से पश्चिम बंगाल आते रहे हैं और यहां की सांस्कृतिक पहचान से जुड़े भोजन जैसे मछली-भात, रसगुल्ला, मिष्टी दही और संदेश का आनंद लेते रहे हैं। उन्होंने इस बहस को राजनीतिक रंग दिए जाने पर सवाल उठाते हुए कहा कि भारतीय जनता पार्टी या राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकारों वाले राज्यों में किसी भी प्रकार की खान-पान पर रोक नहीं है और न ही ऐसी किसी नीति का समर्थन किया जाता है।

उन्होंने इस अवसर पर ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार पर भी तीखा हमला बोला। ठाकुर ने आरोप लगाया कि राज्य में बेरोजगारी बढ़ रही है और युवा बड़ी संख्या में पलायन करने को मजबूर हैं। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार पर विभिन्न योजनाओं में अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं, जिससे जनता में असंतोष बढ़ा है।

सीमा सुरक्षा के मुद्दे को उठाते हुए उन्होंने दावा किया कि राज्य सरकार पर्याप्त सहयोग नहीं कर रही, जिससे सीमावर्ती क्षेत्रों में चुनौतियां बनी हुई हैं। साथ ही, महिलाओं की सुरक्षा को लेकर भी उन्होंने चिंता जताई और कहा कि हाल के वर्षों में कई घटनाओं ने राज्य की कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं।

अनुराग ठाकुर ने विपक्ष पर भय और भ्रम का माहौल बनाने का आरोप लगाते हुए कहा कि जनता को गुमराह करने के बजाय वास्तविक मुद्दों पर काम करने की जरूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि उनकी पार्टी को सत्ता का अवसर मिलता है तो राज्य के विकास, सांस्कृतिक पहचान और नागरिकों की स्वतंत्रता को प्राथमिकता दी जाएगी।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में यह बयान ऐसे समय आया है जब चुनावी बहसें लगातार तीखी होती जा रही हैं और विभिन्न दल अपने-अपने मुद्दों के जरिए मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। खान-पान जैसे सांस्कृतिक विषय का राजनीतिक विमर्श में आना यह भी दर्शाता है कि चुनावी रणनीतियां अब सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं को भी गहराई से छू रही हैं।

आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह बहस किस दिशा में आगे बढ़ती है और मतदाता इन मुद्दों को किस नजर से देखते हैं, क्योंकि चुनावी माहौल में हर बयान और हर मुद्दा राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।

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