हरियाणा राज्यसभा चुनाव: क्रॉस वोटिंग से हिली कांग्रेस, एक वोट से बची साख; नेतृत्व पर उठे गंभीर सवाल

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हरियाणा के हालिया राज्यसभा चुनाव ने सियासी हलकों में हलचल मचा दी है। बेहद करीबी मुकाबले में कांग्रेस अपने उम्मीदवार को जिताने में तो सफल रही, लेकिन जिस तरह क्रॉस वोटिंग और वोट रद्द होने की घटनाएं सामने आईं, उसने पार्टी की अंदरूनी एकजुटता और नेतृत्व क्षमता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। यह जीत जितनी राहत देने वाली है, उतनी ही चेतावनी भी।

चुनाव में कुल 90 विधायकों में से 2 ने मतदान नहीं किया, जिसके चलते 88 वोटों की गणना हुई। इनमें से 5 वोट रद्द हो गए, जिनमें 4 कांग्रेस विधायकों के थे। इस तरह कुल 83 वोट ही वैध माने गए। परिणामों के गणित ने साफ संकेत दिया कि कांग्रेस बेहद पतली धार पर खड़ी थी।

भाजपा की ओर से Sanjay Bhatia और कांग्रेस की ओर से Karamveer Boudh चुनाव मैदान में थे, जबकि भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार सतीश नांदल भी मुकाबले को त्रिकोणीय बना रहे थे। भाजपा के 47 वैध वोटों में से 39 वोट संजय भाटिया को मिले, जबकि 8 वोट सतीश नांदल के खाते में गए।

दूसरी ओर कांग्रेस के 33 वैध वोटों में से 5 विधायकों ने पार्टी लाइन से हटकर सतीश नांदल के पक्ष में मतदान किया। इसके बावजूद कांग्रेस उम्मीदवार कर्मवीर बौद्ध को 28 वोट हासिल हुए, जो उनकी जीत के लिए पर्याप्त साबित हुए। लेकिन यह जीत महज एक वोट के अंतर पर टिकी रही। यदि भाजपा का एक भी वोट रद्द न होता या कांग्रेस का एक और विधायक क्रॉस वोटिंग कर देता, तो परिणाम पूरी तरह बदल सकता था।

इस पूरे घटनाक्रम ने कांग्रेस के भीतर अनुशासनहीनता और असंतोष की परतें उजागर कर दी हैं। क्रॉस वोटिंग कोई नई बात नहीं है, लेकिन बार-बार ऐसी घटनाओं का सामने आना यह दर्शाता है कि पार्टी के भीतर संवाद और नियंत्रण की कमी बनी हुई है। खासतौर पर यह तब और गंभीर हो जाता है जब पिछली राज्यसभा चुनावों में भी पार्टी को इसी तरह के कारणों से नुकसान उठाना पड़ा था।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति सीधे तौर पर शीर्ष नेतृत्व के रवैये से जुड़ी हुई है। Rahul Gandhi पर यह सवाल उठ रहे हैं कि क्या उन्होंने पहले के अनुभवों से पर्याप्त सबक लिया। पिछली बार जब पार्टी उम्मीदवार को हार का सामना करना पड़ा था, तब भी क्रॉस वोटिंग के आरोप लगे थे, लेकिन उस समय सख्त कार्रवाई नहीं की गई। उसी ‘नरम रुख’ का परिणाम आज फिर सामने आया है।

हरियाणा की राजनीति में यह संदेश साफ गया है कि कांग्रेस के भीतर कुछ विधायक पार्टी लाइन से हटकर निर्णय लेने में हिचकिचाते नहीं हैं। ऐसे ‘ब्लैक शीप’ यदि समय रहते चिन्हित कर उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की गई, तो भविष्य के चुनावों में पार्टी के लिए स्थिति और जटिल हो सकती है।

वहीं, भाजपा ने इस पूरे घटनाक्रम को कांग्रेस की अंदरूनी कमजोरी के रूप में प्रस्तुत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सत्तारूढ़ पक्ष का मानना है कि कांग्रेस नेतृत्व अपने विधायकों को एकजुट रखने में असफल रहा है, जिसका सीधा लाभ विपक्ष को मिला।

कांग्रेस के लिए यह परिणाम दोहरी तस्वीर पेश करता है। एक तरफ उम्मीदवार की जीत से तत्काल राहत मिली है, लेकिन दूसरी तरफ जिस तरह यह जीत हासिल हुई, उसने पार्टी की रणनीतिक और संगठनात्मक खामियों को उजागर कर दिया है। यह स्पष्ट संकेत है कि केवल संख्या बल ही पर्याप्त नहीं, बल्कि अनुशासन और नेतृत्व की पकड़ भी उतनी ही जरूरी है।

आगे बढ़ते हुए कांग्रेस के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह आत्ममंथन करे। पार्टी को न केवल क्रॉस वोटिंग करने वाले विधायकों की पहचान कर सख्त कदम उठाने होंगे, बल्कि संगठनात्मक स्तर पर भी सुधार लाना होगा। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो भविष्य में इसी तरह की परिस्थितियां बड़े चुनावी नुकसान का कारण बन सकती हैं।

हरियाणा राज्यसभा चुनाव ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि राजनीति में छोटी-सी चूक भी बड़े परिणाम बदल सकती है। कांग्रेस फिलहाल इस ‘बाल-बाल बची’ जीत का जश्न भले मना ले, लेकिन आने वाले समय में उसे अपने घर को दुरुस्त करना ही होगा, वरना ऐसी स्थितियां बार-बार उसकी सियासी राह को कठिन बना सकती हैं।

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