हिमाचल में बदलता मौसम: बारिश, आंधी और बढ़ती गर्मी का सेब बागवानों पर गहराता असर

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हिमाचल प्रदेश इन दिनों मौसम के अस्थिर दौर से गुजर रहा है, जहां एक ओर अचानक बारिश और आंधी-तूफान देखने को मिल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर तापमान में धीरे-धीरे वृद्धि भी दर्ज की जा रही है। यह बदलता मौसम केवल सामान्य जनजीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सबसे बड़ा असर राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले सेब बागवानों पर पड़ रहा है। राज्य के ऊपरी और मध्यम पर्वतीय क्षेत्रों में फैले सेब बागानों के लिए यह समय बेहद संवेदनशील होता है, क्योंकि इसी अवधि में फूल आने से लेकर फल बनने की प्रक्रिया शुरू होती है।

हिमाचल प्रदेश में लगभग 2.3 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बागवानी होती है, जिसमें से करीब 1.1 लाख हेक्टेयर क्षेत्र केवल सेब की खेती के अंतर्गत आता है। राज्य के लगभग 10 लाख से अधिक लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सेब उत्पादन से जुड़े हुए हैं। ऐसे में मौसम में किसी भी प्रकार का असंतुलन सीधे तौर पर लाखों परिवारों की आय को प्रभावित करता है।

इस समय सेब के पेड़ों में फूल आने और फल सेट होने का चरण चल रहा है। अचानक होने वाली बारिश और तेज हवाएं इन फूलों को गिरा देती हैं, जिससे फल बनने की संभावना कम हो जाती है। इसके अलावा ओलावृष्टि की घटनाएं भी बागवानों के लिए गंभीर खतरा बन जाती हैं, क्योंकि यह सीधे पेड़ों और नव विकसित फलों को नुकसान पहुंचाती हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, यदि इस चरण में 20 से 30 प्रतिशत तक फूल झड़ जाते हैं, तो उत्पादन में 15 से 25 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है।

दूसरी ओर, तापमान में हो रही वृद्धि भी उतनी ही चिंताजनक है। सेब की अच्छी पैदावार के लिए सर्दियों में पर्याप्त ठंड (चिलिंग आवर्स) जरूरी होती है। हालांकि इस वर्ष कई क्षेत्रों में चिलिंग आवर्स पहले ही सामान्य से कम रहे हैं, और अब गर्मी जल्दी बढ़ने से फलों के आकार और गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तापमान 30 डिग्री सेल्सियस से ऊपर लगातार बना रहता है, तो सेब के आकार में कमी और रंगत में गिरावट देखी जा सकती है, जिससे बाजार में कीमत प्रभावित होती है।

मौसम के इस बदलाव का एक और बड़ा असर कीट और रोगों के बढ़ने के रूप में सामने आ रहा है। बारिश और नमी के कारण स्कैब (Apple Scab) जैसे फफूंदजनित रोग तेजी से फैल सकते हैं। इसके नियंत्रण के लिए बागवानों को बार-बार दवाइयों का छिड़काव करना पड़ता है, जिससे लागत बढ़ जाती है। पहले जहां एक सीजन में 4 से 5 स्प्रे पर्याप्त होते थे, वहीं अब यह संख्या 8 से 10 तक पहुंच रही है, जिससे प्रति हेक्टेयर लागत में हजारों रुपये की वृद्धि हो रही है।

केवल सेब ही नहीं, बल्कि आड़ू, प्लम, नाशपाती और चेरी जैसी अन्य फल फसलें भी इस मौसमीय अस्थिरता से प्रभावित हो रही हैं। कई क्षेत्रों में समय से पहले फूल आने के बाद अचानक तापमान गिरने या बारिश होने से फल बनने की प्रक्रिया बाधित हुई है। इससे कुल बागवानी उत्पादन पर व्यापक असर पड़ने की आशंका है।

इस पूरे परिदृश्य का सीधा प्रभाव राज्य की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। हिमाचल प्रदेश हर साल लगभग 5,000 से 6,000 करोड़ रुपये का सेब उत्पादन करता है। यदि मौसम की मार से उत्पादन में गिरावट आती है, तो इसका असर न केवल बागवानों की आय पर पड़ेगा, बल्कि इससे जुड़े ट्रांसपोर्ट, पैकेजिंग, कोल्ड स्टोरेज और मार्केटिंग जैसे सेक्टर भी प्रभावित होंगे।

सरकार और कृषि विशेषज्ञ लगातार बागवानों को मौसम के अनुसार फसल प्रबंधन की सलाह दे रहे हैं। आधुनिक तकनीकों जैसे एंटी-हेल नेट, ड्रिप सिंचाई और मौसम आधारित पूर्वानुमान सेवाओं को अपनाने पर जोर दिया जा रहा है। इसके साथ ही फसल बीमा योजनाओं के तहत नुकसान की भरपाई के प्रयास भी किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इन योजनाओं का लाभ अभी भी सीमित है।

बदलते जलवायु पैटर्न के कारण अब यह स्पष्ट होता जा रहा है कि पारंपरिक खेती के तरीके पर्याप्त नहीं रह गए हैं। बागवानों को नई तकनीकों, बेहतर किस्मों और वैज्ञानिक प्रबंधन की ओर तेजी से बढ़ना होगा। विशेषज्ञ यह भी सुझाव दे रहे हैं कि ऊंचाई के आधार पर फसलों के पैटर्न में बदलाव लाना होगा, क्योंकि कुछ निचले इलाकों में सेब की खेती अब धीरे-धीरे कम अनुकूल होती जा रही है।

कुल मिलाकर, हिमाचल प्रदेश में बारिश, आंधी और बढ़ती गर्मी का यह मिला-जुला प्रभाव एक गंभीर चेतावनी के रूप में सामने आ रहा है। यह केवल एक मौसमीय बदलाव नहीं, बल्कि बागवानी आधारित अर्थव्यवस्था के लिए एक दीर्घकालिक चुनौती है, जिसके समाधान के लिए नीति स्तर से लेकर खेत स्तर तक समन्वित प्रयासों की आवश्यकता है।

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