जय जगन्नाथ: आस्था के महासागर में डूबा पुरी, आज भाई-बहनों संग भक्तों को दर्शन देंगे महाप्रभु; विश्वविख्यात रथ यात्रा का शुभारंभ

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ओडिशा के पवित्र तीर्थ नगरी पुरी में गुरुवार को विश्वप्रसिद्ध भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा का शुभारंभ हो गया। सनातन परंपरा के सबसे भव्य और व्यापक धार्मिक आयोजनों में शामिल इस उत्सव में भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के साथ श्रीमंदिर से निकलकर गुंडिचा मंदिर की वार्षिक यात्रा पर रवाना होंगे। लाखों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में महाप्रभु अपने भक्तों को दुर्लभ दर्शन देंगे और श्रद्धा, भक्ति तथा सांस्कृतिक विरासत का अद्भुत संगम एक बार फिर विश्व के सामने दिखाई देगा।

रथ यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारत की हजारों वर्ष पुरानी आध्यात्मिक परंपरा, समावेशी संस्कृति और जनभागीदारी का जीवंत प्रतीक मानी जाती है। इस दिन महाप्रभु स्वयं अपने गर्भगृह से बाहर निकलकर भक्तों के बीच आते हैं। यही कारण है कि इसे भगवान और भक्त के मिलन का सबसे बड़ा उत्सव भी कहा जाता है।

गुरुवार तड़के से ही श्रीमंदिर में पारंपरिक वैदिक अनुष्ठानों और धार्मिक विधियों का क्रम शुरू हो गया। इसके बाद भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा को पारंपरिक ‘पहंडी’ उत्सव के माध्यम से मंदिर से बाहर लाया जाएगा। ढोल, मृदंग, शंख, घंटियों और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच देव विग्रहों का यह दिव्य जुलूस श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत भावुक और आध्यात्मिक क्षण माना जाता है।

लगातार हो रही वर्षा भी श्रद्धालुओं के उत्साह को कम नहीं कर सकी। सुबह से ही पुरी की ऐतिहासिक बड़दंडा (ग्रैंड रोड) पर लाखों श्रद्धालु एकत्र होने लगे। कोई भजन-कीर्तन में लीन दिखाई दिया, तो कोई नृत्य करते हुए महाप्रभु के जयकारे लगा रहा था। अनेक परिवार छोटे बच्चों और बुजुर्गों के साथ घंटों से सिंहद्वार के सामने प्रतीक्षा करते रहे, ताकि भगवान के प्रथम दर्शन का सौभाग्य प्राप्त कर सकें।

रथ यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस दिन भगवान स्वयं अपने भक्तों के बीच आते हैं। मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश की सामान्य धार्मिक मर्यादाओं के विपरीत, रथ यात्रा के दौरान हर जाति, वर्ग, समुदाय और देश-विदेश से आए श्रद्धालुओं को बिना किसी भेदभाव के महाप्रभु के दर्शन और रथ खींचने का अवसर मिलता है। यही समावेशी भावना इस उत्सव को वैश्विक पहचान प्रदान करती है।

हर वर्ष की तरह इस बार भी तीन विशाल लकड़ी के रथ पारंपरिक शिल्पकला के अनुसार नए सिरे से तैयार किए गए हैं। भगवान जगन्नाथ का रथ ‘नंदीघोष’, भगवान बलभद्र का ‘तलध्वज’ और देवी सुभद्रा का ‘दर्पदलन’ विशेष आकर्षण का केंद्र हैं। इनमें नंदीघोष लगभग 45 फीट ऊंचा है और हजारों श्रद्धालु रस्सियों के माध्यम से इन रथों को खींचते हुए श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर तक लेकर जाते हैं। मान्यता है कि गुंडिचा मंदिर भगवान की मौसी का घर है, जहां तीनों देवता नौ दिनों तक प्रवास करते हैं।

धार्मिक परंपरा के अनुसार, इस वर्ष बहुदा यात्रा यानी भगवान की वापसी यात्रा 24 जुलाई को निकलेगी, जबकि 25 जुलाई को भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा स्वर्णाभूषणों से अलंकृत होकर ‘सुना बेशा’ धारण करेंगे। इस दिव्य स्वरूप के दर्शन के लिए भी देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं।

रथ यात्रा के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि यह पर्व भारत की सनातन आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत का उज्ज्वल प्रतीक है। उन्होंने कहा कि रथ यात्रा से जुड़ी परंपराएं विनम्रता, सामूहिक सहभागिता और निस्वार्थ सेवा की भावना का संदेश देती हैं तथा पीढ़ियों से भारत ही नहीं, पूरी दुनिया को प्रेरित करती रही हैं।

प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में कामना की कि महाप्रभु जगन्नाथ सभी देशवासियों को उत्तम स्वास्थ्य, सुख, समृद्धि और नई ऊर्जा प्रदान करें। उन्होंने कहा कि भगवान का आशीर्वाद समाज में एकता, सद्भाव और सेवा की भावना को और मजबूत करे। उन्होंने ‘जय जगन्नाथ’ का उद्घोष करते हुए देशवासियों के जीवन में शांति और कल्याण की प्रार्थना भी की।

पुरी की रथ यात्रा केवल ओडिशा का उत्सव नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा का जीवंत उत्सव है। सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा, उल्लास और आध्यात्मिक ऊर्जा के साथ आगे बढ़ रही है। हर वर्ष करोड़ों श्रद्धालुओं को यह संदेश देती है कि ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग प्रेम, समानता, सेवा और समर्पण से होकर गुजरता है।

महाप्रभु जगन्नाथ की रथ यात्रा एक बार फिर इस शाश्वत सत्य को जीवंत करती है कि जब भगवान स्वयं अपने भक्तों के बीच आते हैं, तब आस्था की कोई सीमा नहीं रहती और संपूर्ण मानवता एक ही सूत्र में बंधी दिखाई देती है।

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