हिसार में जीवन कुंडू हत्याकांड पर बढ़ता आक्रोश, 10 दिन बाद भी अंतिम संस्कार नहीं; सरकार के सामने अब निर्णायक कार्रवाई की चुनौती

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हिसार — किसी परिवार के लिए अपने बेटे की हत्या के बाद अंतिम संस्कार तक न कर पाना केवल व्यक्तिगत पीड़ा का विषय नहीं होता, बल्कि यह उस गहरे असंतोष को भी दर्शाता है जो न्याय व्यवस्था और प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर पैदा हो सकता है। हिसार के जीवन कुंडू हत्याकांड को 10 दिन बीत चुके हैं, लेकिन आरोपियों की गिरफ्तारी न होने के विरोध में परिवार और खाप प्रतिनिधियों का धरना अभी भी जारी है। बुधवार को लघु सचिवालय के बाहर हुई बड़ी महापंचायत ने इस मामले को स्थानीय विरोध से आगे बढ़ाकर व्यापक सामाजिक मुद्दे का रूप दे दिया।

महापंचायत में किसान संगठनों, खाप प्रतिनिधियों, श्रमिक संगठनों और विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े सैकड़ों लोगों ने भाग लिया। करीब चार घंटे चली बैठक में आंदोलन की अगली रणनीति तय की गई और सरकार तथा प्रशासन को आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए 13 अगस्त तक का समय दिया गया।

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जब तक हत्या के आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं होती, तब तक परिवार अपने बेटे का अंतिम संस्कार नहीं करेगा। उनका आरोप है कि घटना के इतने दिन बाद भी पुलिस की कार्रवाई उस स्तर तक नहीं पहुंची है, जिसकी एक गंभीर हत्या के मामले में अपेक्षा की जाती है। इसी वजह से परिवार के साथ बड़ी संख्या में सामाजिक और किसान संगठन भी खड़े हो गए हैं।

महापंचायत में 11 से 12 सदस्यों की एक कमेटी ने आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए कई फैसले लिए। कमेटी ने चेतावनी दी कि यदि 13 अगस्त तक आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं होती है, तो 14 अगस्त को सुबह 11 बजे से दोपहर 2 बजे तक हरियाणा के टोल प्लाजा और प्रमुख मार्गों पर तीन घंटे का चक्का जाम किया जाएगा।

प्रदर्शनकारियों ने इसके बाद आंदोलन को और व्यापक बनाने की चेतावनी भी दी है। महापंचायत में यह घोषणा की गई कि यदि मांगें पूरी नहीं हुईं तो 15 अगस्त को हांसी में मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के ध्वजारोहण कार्यक्रम का विरोध किया जाएगा। यह चेतावनी इस बात का संकेत है कि मामला अब केवल एक परिवार की न्याय की मांग तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि सरकार के लिए कानून-व्यवस्था और सामाजिक विश्वास से जुड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

परिवार की पीड़ा आंदोलन के केंद्र में है। कमेटी सदस्य सुरेश कोथ ने कहा कि उनके बेटे की हत्या को 10 दिन हो चुके हैं, लेकिन परिवार को अब तक न्याय की दिशा में कोई ठोस परिणाम दिखाई नहीं दिया। उनका कहना था कि परिवार को उम्मीद थी कि प्रशासन और सरकार मामले में तेजी से कार्रवाई करेंगे, लेकिन गिरफ्तारी न होने से उनका भरोसा कमजोर हुआ है।

उन्होंने कहा कि जीवन केवल उसके परिवार या गांव का बेटा नहीं था, बल्कि पूरे समाज का बेटा था। इसी भाव के साथ उन्होंने लोगों से आंदोलन में शामिल होने की अपील की। परिवार और आंदोलनकारी संगठनों का कहना है कि जब तक आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किया जाता, उनका संघर्ष जारी रहेगा।

महापंचायत में शमशेर सिंह लंबरदार सहित कई वक्ताओं ने पुलिस और जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि हत्या के मामले में अब तक अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आया है। उन्होंने मांग की कि यदि जांच या कार्रवाई में किसी अधिकारी की लापरवाही सामने आती है तो उसके खिलाफ भी जवाबदेही तय की जानी चाहिए।

इस आंदोलन का सामाजिक पक्ष भी महत्वपूर्ण है। जब किसी हत्या के बाद पीड़ित परिवार को न्याय के लिए सार्वजनिक आंदोलन का सहारा लेना पड़ता है और मामला खापों, किसान संगठनों तथा सामाजिक संस्थाओं तक पहुंच जाता है, तो यह केवल एक आपराधिक मामले की जांच का विषय नहीं रह जाता। यह लोगों के उस विश्वास से जुड़ जाता है कि गंभीर अपराध होने के बाद पुलिस और प्रशासन कितनी तेजी और निष्पक्षता से कार्रवाई करते हैं।

हरियाणा जैसे राज्य में खाप और सामाजिक संगठनों की भूमिका ग्रामीण समाज में काफी प्रभावशाली रही है। ऐसे संगठनों का किसी आपराधिक मामले में सामूहिक रूप से लामबंद होना प्रशासन के लिए एक संकेत है कि मामला व्यापक जनभावना को प्रभावित कर रहा है। हालांकि, किसी भी आंदोलन के दौरान कानून-व्यवस्था और आम नागरिकों की रोजमर्रा की आवाजाही को प्रभावित न करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

सरकार के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह पीड़ित परिवार की न्याय की मांग को गंभीरता से लेते हुए जांच को तेजी दे और लोगों को यह भरोसा दिलाए कि मामले में निष्पक्ष कार्रवाई हो रही है। आरोपियों की गिरफ्तारी, जांच की प्रगति और यदि आवश्यक हो तो लापरवाही के लिए जिम्मेदारी तय करने जैसे कदम स्थिति को शांत करने में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

वहीं, प्रशासन को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि विरोध प्रदर्शन कानून के दायरे में रहें और किसी भी स्थिति में आम जनता को अनावश्यक परेशानी न हो। टोल और प्रमुख मार्ग बंद करने जैसे आंदोलन से हजारों यात्रियों और रोजमर्रा की आवाजाही प्रभावित हो सकती है। ऐसे में सरकार के लिए संवाद का रास्ता खुला रखना और समय रहते समाधान की कोशिश करना जरूरी है।

जीवन कुंडू मामले ने एक बार फिर यह सवाल उठाया है कि किसी गंभीर अपराध के बाद जांच में देरी और आरोपियों की गिरफ्तारी में लंबा समय लगने से समाज में किस तरह असुरक्षा और असंतोष पैदा हो सकता है। सरकार के लिए यह केवल एक मामले का निपटारा करने की चुनौती नहीं, बल्कि कानून के शासन और नागरिकों के भरोसे को मजबूत करने का अवसर भी है।

अब 13 अगस्त की समयसीमा महत्वपूर्ण हो गई है। यदि इससे पहले पुलिस ठोस कार्रवाई और जांच की स्थिति को लेकर स्पष्ट जानकारी देती है, तो तनाव कम करने की संभावना बन सकती है। लेकिन यदि प्रदर्शनकारियों की मांगें अनसुनी रहती हैं, तो 14 अगस्त से प्रस्तावित आंदोलन राज्यव्यापी रूप ले सकता है।

ऐसे मामलों में सरकार को केवल विरोध बढ़ने का इंतजार करने के बजाय तत्काल, पारदर्शी और कानूनसम्मत कार्रवाई करनी चाहिए। एक परिवार के न्याय की मांग को समय पर सुनना और अपराध के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई करना न केवल कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी है, बल्कि समाज में यह भरोसा बनाए रखने के लिए भी जरूरी है कि गंभीर अपराधों के सामने व्यवस्था कमजोर नहीं पड़ती।

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