देश के तीन राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश की छह सीटों पर आज हो रहे उपचुनाव महज स्थानीय राजनीतिक मुकाबले नहीं हैं। पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेजीनगर, तमिलनाडु की मदुरंतकम और धारापुरम, पुडुचेरी की थट्टनचावडी तथा असम की नगांव लोकसभा सीट पर हो रहा मतदान ऐसे समय में हो रहा है जब चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका को लेकर देश में गंभीर राजनीतिक और संस्थागत बहस चल रही है।
इन चुनावों की अहमियत इसलिए और बढ़ गई है क्योंकि मतदान से ठीक पहले सुप्रीम कोर्ट ने CEC ज्ञानेश कुमार के कथित एकतरफा फैसलों से जुड़े मामले में चुनाव आयोग और केंद्र से जवाब मांगा है। अदालत ने फिलहाल CEC को निलंबित करने से इनकार किया है, लेकिन उसने यह स्पष्ट किया है कि चुनाव आयोग को कानून के अनुसार सामूहिक रूप से काम करना होगा। मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को होनी है।

विवाद की पृष्ठभूमि में चुनावी प्रक्रिया से जुड़े फैसलों को लेकर चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की कथित आपत्तियां हैं। याचिका में आरोप लगाया गया है कि अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच कम से कम 14 मामलों में दोनों चुनाव आयुक्तों ने उन फैसलों पर आपत्ति दर्ज की जिन्हें चुनाव आयोग के नाम से आगे बढ़ाया गया। इनमें मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR सहित कई महत्वपूर्ण चुनावी प्रक्रियाएं शामिल बताई गई हैं। हालांकि, इन आरोपों की अंतिम न्यायिक पुष्टि अभी नहीं हुई है और चुनाव आयोग को अपना पक्ष रखने का अवसर मिला है।
यही कारण है कि आज का मतदान चुनाव आयोग के लिए भी सामान्य चुनावी प्रक्रिया से कहीं अधिक महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आयोग ने छह सीटों पर चुनाव के लिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों और VVPAT की व्यवस्था की है तथा संबंधित निर्वाचन क्षेत्रों की मतदाता सूचियों को अंतिम रूप दिया जा चुका है। चुनाव आयोग लगातार यह रेखांकित करता रहा है कि स्वतंत्र, निष्पक्ष और विश्वसनीय चुनाव के लिए शुद्ध मतदाता सूची बुनियादी आवश्यकता है।
ऐसे माहौल में आयोग के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल शांतिपूर्ण मतदान कराना नहीं, बल्कि यह भरोसा कायम करना भी है कि पूरी चुनावी प्रक्रिया पारदर्शी, निष्पक्ष और संस्थागत नियमों के अनुसार संचालित हो रही है।
पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम सबसे प्रतीकात्मक मुकाबला बन गया है। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के विधानसभा चुनाव में दो सीटें जीतने के बाद नंदीग्राम खाली हुई सीट पर उपचुनाव हो रहा है। भाजपा ने हसीरानी रथ को मैदान में उतारा है। वहीं ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल कांग्रेस गुट ने कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान का समर्थन किया है, जबकि तृणमूल के दूसरे गुट ने भी अपना उम्मीदवार उतारा है। CPI भी मुकाबले में है। इसलिए नंदीग्राम का परिणाम केवल एक विधानसभा सीट का परिणाम नहीं होगा, बल्कि नई भाजपा सरकार की शुरुआती राजनीतिक पकड़ और विपक्ष की एकजुटता का भी संकेत देगा।
रेजीनगर में मुकाबला और अधिक बिखरा हुआ है। भाजपा, कांग्रेस, CPI(M), तृणमूल के दो गुट और आम जनता उन्नयन पार्टी मैदान में हैं। इस सीट पर परिणाम यह बताएगा कि पश्चिम बंगाल की नई राजनीतिक व्यवस्था में विपक्षी बिखराव का लाभ किसे मिलता है और भाजपा अपने विस्तार को किस हद तक आगे बढ़ा पाती है।
तमिलनाडु की मदुरंतकम और धारापुरम सीटें अभिनेता से राजनेता बने विजय और उनकी पार्टी TVK के लिए पहली बड़ी चुनावी परीक्षा मानी जा रही हैं। दोनों सीटों पर पहले AIADMK के टिकट पर जीतने वाले विधायक बाद में विजय के खेमे में चले गए और उनके इस्तीफे के कारण उपचुनाव की स्थिति बनी। अब TVK, DMK, AIADMK और CPI के बीच मुकाबला है। विजय ने दोनों क्षेत्रों में आक्रामक प्रचार किया है। ऐसे में इन परिणामों से यह संकेत मिलेगा कि उनकी पार्टी विधानसभा चुनाव के बाद जमीनी स्तर पर अपना संगठन और मतदाता आधार कितना मजबूत कर पाई है।
असम की नगांव लोकसभा सीट भी महत्वपूर्ण है। यहां भाजपा, कांग्रेस और AIUDF के बीच त्रिकोणीय मुकाबला है। कांग्रेस के लिए सीट बचाना अपने पारंपरिक समर्थन आधार को बनाए रखने की चुनौती है, जबकि भाजपा के लिए यह राज्य में अपने प्रभाव का विस्तार करने का अवसर है। पुडुचेरी की थट्टनचावडी सीट चार महीने पुरानी एनडीए सरकार और मुख्यमंत्री एन. रंगासामी के नेतृत्व की लोकप्रियता की भी परीक्षा करेगी।
लेकिन इन सभी राजनीतिक मुकाबलों से ऊपर एक बड़ा सवाल चुनाव आयोग की विश्वसनीयता का है।
विपक्षी दलों और नागरिक समूहों की ओर से CEC ज्ञानेश कुमार और SIR तथा मतदाता सूचियों को लेकर पहले से विरोध और राजनीतिक अभियान चल रहे हैं। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप चुनाव आयोग पर संस्थागत दबाव को और बढ़ाता है। अदालत ने अभी कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है, लेकिन उसने यह संकेत जरूर दिया है कि यदि चुनाव आयोग के फैसले निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के विपरीत पाए गए तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है।
इसलिए आज के छह उपचुनावों में राजनीतिक दलों के साथ-साथ चुनाव आयोग की परीक्षा भी हो रही है। मतदान प्रतिशत, कानून-व्यवस्था, शिकायतों के निपटारे, EVM-VVPAT प्रक्रिया और मतदाता सूची को लेकर उठने वाले सवालों पर पूरे देश की नजर रहेगी। 9 अक्टूबर को आने वाले नतीजे सरकारों और राजनीतिक दलों को तो संकेत देंगे ही, लेकिन उससे पहले और उसके बाद चुनाव आयोग किस तरह पारदर्शिता और निष्पक्षता का भरोसा कायम करता है, यह उसकी संस्थागत साख के लिए शायद उससे भी बड़ा मुद्दा होगा।
इन चुनावों का परिणाम इसलिए केवल छह सीटों की राजनीतिक जीत-हार के रूप में नहीं देखा जाएगा। मौजूदा विवाद के बीच यह चुनाव आयोग के लिए यह दिखाने का अवसर भी है कि देश की चुनावी प्रक्रिया राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर संविधान, कानून और संस्थागत विश्वसनीयता के आधार पर संचालित हो रही है।
