संगठन में देरी से नाराज़ कार्यकर्ता, कांग्रेस नेतृत्व की खामोशी पर हिमाचल में बढ़ता असंतोष

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हिमाचल में कांग्रेस की असमंजस भरी चुप्पी: कार्यकर्ताओं का धैर्य टूटा, संगठनात्मक शून्यता से उपजा असंतोष

भारत के सबसे पुराने राजनीतिक दल—भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस—के भीतर हिमाचल प्रदेश में एक अजीब किस्म की बेचैनी पनप रही है। दिल्ली में बैठा पार्टी का शीर्ष नेतृत्व जब प्रदेश इकाइयों के पुनर्गठन को लेकर लंबा मौन साध ले, तो असंतोष पनपता है, और हिमाचल कांग्रेस की मौजूदा स्थिति इसी चुप्पी का परिणाम है। पिछले छह महीनों से हिमाचल प्रदेश कांग्रेस कमेटी (HPCC) का पुनर्गठन अधर में लटका है। परिणामस्वरूप, पार्टी कार्यकर्ता न केवल हाशिए पर महसूस कर रहे हैं, बल्कि सार्वजनिक मंचों पर नाराजगी भी जाहिर कर रहे हैं।

हिमाचल की राजनीति में यह दौर उस समय आया है जब कांग्रेस राज्य में सत्तारूढ़ है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू और डिप्टी सीएम मुकेश अग्निहोत्री के नेतृत्व में सरकार चल रही है। बावजूद इसके, संगठन का ढांचा विखंडित और दिशाहीन दिखाई देता है। वर्तमान में सिर्फ सांसद प्रतिभा सिंह को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर कार्यभार सौंपा गया है, लेकिन उनका कार्यकाल भी प्रश्नों के घेरे में है, क्योंकि उनके सुझावों और आपत्तियों को पार्टी हाईकमान द्वारा नज़रअंदाज़ किया जाता प्रतीत होता है।

ताजा विवाद उस समय खुलकर सामने आया जब बिलासपुर में आयोजित एक कार्यकर्ता बैठक में पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं ने खुले मंच पर अपनी नाराजगी जाहिर की। प्रतिभा सिंह की मौजूदगी में कार्यकर्ताओं ने न केवल HPCC के पुनर्गठन में देरी पर सवाल उठाए, बल्कि यहां तक कह दिया कि यदि उनकी आवाज़ नहीं सुनी जा रही तो उन्हें अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। यह दृश्य कांग्रेस जैसी अनुशासित मानी जाने वाली पार्टी के लिए अप्रत्याशित और चौंकाने वाला था।

दिल्ली में इस समय कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक चल रही है, जिसमें प्रतिभा सिंह, सुक्खू और अग्निहोत्री तीनों मौजूद हैं। बिलासपुर में हुई बगावत के बाद इन नेताओं पर अब अतिरिक्त दबाव है कि वे संगठनात्मक मुद्दों पर केंद्र को कोई ठोस निर्णय लेने के लिए बाध्य करें। कार्यकर्ताओं का स्पष्ट सवाल है—बिना संगठित ढांचे के पार्टी आखिर किस तरह काम करेगी?

इस पूरे घटनाक्रम में एक और पहलू चिंता का कारण है—सरकार और संगठन के बीच संतुलन की कमी। कुछ कार्यकर्ताओं ने यह आरोप लगाया कि विभिन्न बोर्डों और निगमों में नियुक्तियों के समय उन लोगों को प्राथमिकता दी जा रही है, जो हाल ही में दूसरी पार्टियों से कांग्रेस में आए हैं। इससे पुराने और निष्ठावान कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़ा है। यह एक गहरी राजनीतिक विसंगति की ओर इशारा करता है, जहां सत्ता तो है, पर संगठित समर्थन नहीं।

इसके अतिरिक्त, अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के नेताओं ने शिमला की एक मस्जिद से जुड़े विवादास्पद मामले को लेकर सरकार के रवैये पर भी नाराजगी जाहिर की है। कार्यकर्ताओं ने इस मुद्दे पर दो मंत्रियों की भूमिका पर भी प्रश्नचिह्न खड़े किए हैं। यह असहमति महज एक संगठनात्मक असंतुलन नहीं, बल्कि पार्टी की नीति निर्धारण में बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक मतों की गूंज का संकेत भी देती है।

इतिहास गवाह है कि कांग्रेस जैसी पार्टी, जो भारत के स्वतंत्रता संग्राम की अगुवाई कर चुकी है, उसके लिए भी अगर स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं की आवाज़ अनसुनी रह जाती है, तो संगठनात्मक ढांचा धीरे-धीरे क्षीण हो जाता है। हिमाचल प्रदेश में अगर HPCC के पुनर्गठन को और टाला गया, तो पार्टी को न केवल आगामी चुनावों में बल्कि जनाधार की स्थायी क्षति का भी सामना करना पड़ सकता है।

आज जब देशभर में क्षेत्रीय दलों का उदय हो रहा है और राष्ट्रीय पार्टियों के सामने विश्वसनीयता की चुनौती है, कांग्रेस जैसे दल के लिए संगठन की मजबूती केवल औपचारिकता नहीं, अस्तित्व का प्रश्न है। हिमाचल का यह प्रकरण दिल्ली में बैठे नेताओं के लिए एक चेतावनी है—देरी अब केवल असंतोष नहीं, बगावत में बदल रही है।

यह लेख हमारे न्यूज़ डेस्क द्वारा अंतरराष्ट्रीय संपादकीय मानकों के अनुरूप स्वचालित रूप से जनरेट और संपादित किया गया है।

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