पंजाब में ज़मीन पूलिंग नीति पर सियासी संग्राम, आप सांसद मालविंदर सिंह कंग ने उठाई आवाज़

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पंजाब में ज़मीन पूलिंग नीति को लेकर किसान संगठनों और विपक्षी दलों की नाराज़गी के बीच अब सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी के भीतर से भी विरोध की आवाज़ें उठने लगी हैं। आनंदपुर साहिब से आप सांसद और पार्टी के पूर्व मुख्य प्रवक्ता मालविंदर सिंह कंग ने इस नीति के खिलाफ खुलकर अपनी राय व्यक्त करते हुए पार्टी से किसानों का भरोसा जीतने की अपील की है।

मालविंदर सिंह कंग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर अपनी पोस्ट में लिखा कि ज़मीन पूलिंग नीति को लेकर जो आपत्तियाँ किसान संगठनों ने उठाई हैं, उन्हें संवेदनशीलता के साथ सुना जाना चाहिए और संवाद के माध्यम से समाधान ढूंढा जाना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि बीते तीन वर्षों में आप सरकार ने किसानों को लगातार कृषि-विद्युत आपूर्ति दी है, नहरों का पानी खेतों तक पहुँचाया है, मंडी सुधार तेज़ी से लागू किए हैं और फसल विविधीकरण को बढ़ावा दिया है। लेकिन उन्होंने यह भी जोड़ा कि किसी भी नीति को ज़मीन पर लागू करने से पहले भरोसा अर्जित करना जरूरी होता है, केवल मान लेना काफी नहीं होता।

कंग ने अपनी पोस्ट में पार्टी को टैग करते हुए यह संकेत भी दिया कि यह केवल प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा है, जिससे जनभावनाओं का गहरा संबंध है।

गौरतलब है कि पंजाब सरकार की ज़मीन पूलिंग नीति के तहत लगभग 65,533 एकड़ कृषि भूमि का अधिग्रहण किया जाना प्रस्तावित है, ताकि नगरीकरण को बढ़ावा दिया जा सके। हालांकि सरकार का दावा है कि यह योजना किसानों को बेहतर मुआवज़ा और दीर्घकालीन लाभ देने के लिए तैयार की गई है, लेकिन जमीनी स्तर पर विरोध लगातार बढ़ रहा है।

संयुक्त किसान मोर्चा के नेताओं के अनुसार, अब तक राज्य के 107 ग्राम पंचायतों ने अपनी ज़मीन अधिग्रहण के लिए न देने के प्रस्ताव पारित कर दिए हैं। इससे स्पष्ट है कि ग्रामीण क्षेत्रों में इस नीति के प्रति गहरा अविश्वास है।

आप के भीतर कंग पहले ऐसे नेता हैं जिन्होंने सार्वजनिक रूप से इस नीति पर सवाल उठाए हैं, जबकि जानकारी के अनुसार, पार्टी के कई विधायक भी निजी तौर पर इस नीति से असहज हैं, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले नेता।

पार्टी नेतृत्व की ओर से इस बयान पर अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन कंग का यह रुख इस बात का संकेत देता है कि किसानों के गुस्से और विरोध के बीच सरकार को इस नीति की पुनः समीक्षा करने की जरूरत पड़ सकती है।

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