हरियाणा में मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया और जापानी इंसेफेलाइटिस जैसी वेक्टर-बोर्न बीमारियों के बढ़ते खतरे को देखते हुए राज्य सरकार ने बड़ा और सख्त कदम उठाया है। सरकार ने हरियाणा महामारी अधिनियम संशोधन 2024 को अधिसूचित कर दिया है, जिसके तहत अब नियमों का उल्लंघन करने वाले अस्पतालों, क्लीनिकों और लैब पर जुर्माना और दंडात्मक कार्रवाई का स्पष्ट प्रावधान किया गया है। यह नियम तुरंत प्रभाव से लागू हो गए हैं और 31 मार्च 2027 तक प्रभावी रहेंगे।
इस संबंध में जानकारी देते हुए अतिरिक्त मुख्य सचिव स्वास्थ्य विभाग डॉ. सुमिता मिश्रा ने बताया कि महामारी अधिनियम, 1897 की धारा 2 के तहत यह अधिसूचना जारी की गई है। उन्होंने कहा कि बीते वर्षों में वेक्टर-जनित बीमारियों के मामलों में लगातार वृद्धि देखी गई है और समय पर पहचान, सटीक जांच, पारदर्शी रिपोर्टिंग और मरीजों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए यह कदम आवश्यक था।
नए नियमों के अनुसार अब राज्य के सभी सरकारी और निजी अस्पतालों, क्लीनिकों और पैथोलॉजी लैब को मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया और जापानी इंसेफेलाइटिस के हर कन्फर्म केस की जानकारी 24 घंटे के भीतर संबंधित जिले के सिविल सर्जन को देना अनिवार्य होगा। इसके साथ-साथ रियल-टाइम मॉनिटरिंग के लिए इन मामलों का विवरण इंटीग्रेटेड हेल्थ इंफॉर्मेशन प्लेटफॉर्म पोर्टल पर भी अपलोड करना होगा। डॉ. मिश्रा ने स्पष्ट किया कि त्वरित रिपोर्टिंग से न केवल आउटब्रेक को रोका जा सकेगा, बल्कि गंभीर मामलों और मौतों में भी कमी लाई जा सकेगी।
सरकार ने डायग्नोस्टिक प्रोटोकॉल को भी सख्त और स्पष्ट किया है। मलेरिया के मामलों को केवल माइक्रोस्कोपी या एंटीजन-आधारित रैपिड डायग्नोस्टिक टेस्ट से पुष्टि के बाद ही पॉजिटिव माना जाएगा और भारत सरकार की ड्रग पॉलिसी के अनुसार पूरा इलाज देना अनिवार्य होगा। डेंगू के मामलों में केवल एलिसा-आधारित एनएस-1, आईजीएम या आरटी-पीसीआर टेस्ट से ही पुष्टि मान्य होगी। जिन मरीजों को पांच दिन से कम बुखार है, उनके लिए एनएस-1 एंटीजन टेस्ट जरूरी होगा, जबकि पांच दिन से अधिक बुखार वाले मरीजों के लिए आईजीएम एंटीबॉडी टेस्ट अनिवार्य किया गया है। बिना कन्फर्म टेस्ट के किसी भी मरीज को डेंगू पॉजिटिव घोषित नहीं किया जा सकेगा।
मरीजों के आर्थिक शोषण को रोकने के लिए सरकार ने डेंगू जांच की अधिकतम कीमत भी तय कर दी है। निजी अस्पताल और लैब एलिसा-आधारित एनएस-1 और आईजीएम टेस्ट के लिए 600 रुपये से अधिक शुल्क नहीं ले सकेंगे। इसके अलावा यदि मरीज को सिंगल डोनर प्लेटलेट्स की जरूरत पड़ती है, तो निजी अस्पताल 11,000 रुपये से अधिक शुल्क नहीं वसूल पाएंगे। जिन निजी लैब में एलिसा टेस्ट की सुविधा उपलब्ध नहीं है, उन्हें मरीज को निर्धारित सरकारी लैब में भेजना होगा या वहां सैंपल भिजवाना अनिवार्य होगा।
नोटिफिकेशन के तहत निदेशक स्वास्थ्य सेवाएं या सिविल सर्जन द्वारा नियुक्त निरीक्षण अधिकारियों को व्यापक अधिकार दिए गए हैं। ये अधिकारी किसी भी परिसर में निगरानी, एंटी-लार्वल उपाय, फॉगिंग या स्प्रे के लिए प्रवेश कर सकेंगे। उन्हें संदिग्ध मरीजों के ब्लड सैंपल लेने, इलाज सुनिश्चित करने, कीटनाशक छिड़काव कराने और ठहरे हुए पानी के स्रोतों के उपचार के निर्देश देने का भी अधिकार होगा।
नियमों का उल्लंघन करने वालों के लिए दंड का स्पष्ट ढांचा तय किया गया है। यदि कोई अस्पताल या लैब निर्धारित डायग्नोस्टिक प्रोटोकॉल का पालन नहीं करता, कन्फर्म मामलों की रिपोर्टिंग नहीं करता, बिना पुष्टि के बीमारी घोषित करता है या मरीज की अधूरी जानकारी देता है, तो पहली बार 1,000 रुपये, दूसरी बार 5,000 रुपये और तीसरी या उसके बाद 10,000 रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा। लगातार नियम तोड़ने पर महामारी अधिनियम, 1897 की धारा 3 के तहत कड़ी कार्रवाई भी की जा सकेगी। लगाए गए जुर्माने के खिलाफ 30 दिनों के भीतर सिविल सर्जन की अध्यक्षता वाली अपीलेट कमेटी में अपील की जा सकेगी।
डॉ. सुमिता मिश्रा ने कहा कि इन नियमों का मूल उद्देश्य मामलों की जल्द पहचान, वैज्ञानिक और मानकीकृत जांच, समय पर इलाज, रिपोर्टिंग में पारदर्शिता और बीमारी के दौरान मरीजों के शोषण को रोकना है। उन्होंने विश्वास जताया कि इन नियमों के सख्त क्रियान्वयन से हरियाणा में वेक्टर-जनित बीमारियों के मौसमी प्रकोप से निपटने की तैयारी और प्रतिक्रिया प्रणाली मजबूत होगी और आम नागरिकों के स्वास्थ्य की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी।

