उत्तर भारत में ‘जॉम्बी ड्रग’ का खतरा: हिमाचल, पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ में बढ़ती घटनाओं ने बढ़ाई चिंता

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मार्च 2026 के अंतिम दिनों में चंडीगढ़ के सेक्टर-33 बी की एक सीसीटीवी फुटेज ने पूरे उत्तर भारत को झकझोर कर रख दिया। वीडियो में एक डिलीवरी बॉय लगभग दो घंटे तक एक ही जगह पर खड़ा दिखाई दिया—बिना किसी हरकत के, जैसे समय थम गया हो। इसी तरह की एक और घटना में एक मजदूर को सड़क पर घंटों तक एक ही स्थिति में खड़े देखा गया। इन घटनाओं को देखने वाले लोग न केवल हैरान थे, बल्कि उनमें डर भी साफ झलक रहा था। सोशल मीडिया पर इन मामलों को ‘जॉम्बी ड्रग’ से जोड़कर देखा जाने लगा है, और अब तक ऐसे कई मामले सामने आने के बाद यह मुद्दा गंभीर सार्वजनिक चिंता का विषय बन गया है।

चंडीगढ़ के पीजीआई के मनोविज्ञान विभाग के विशेषज्ञों ने इस नए खतरे को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है। डॉक्टरों के अनुसार, यह तथाकथित ‘जॉम्बी ड्रग’ दरअसल जाइलाज़ीन और फेंटानिल जैसे खतरनाक रसायनों का मिश्रण हो सकता है। जाइलाज़ीन एक ऐसी दवा है जिसका उपयोग आमतौर पर पशुओं को शांत करने या सुलाने के लिए किया जाता है, जबकि फेंटानिल एक अत्यंत शक्तिशाली सिंथेटिक ओपिओइड है, जो हेरोइन से भी कई गुना ज्यादा प्रभावी और खतरनाक माना जाता है।

विशेषज्ञ बताते हैं कि जब ये दोनों पदार्थ मिलकर शरीर में प्रवेश करते हैं, तो व्यक्ति की चेतना और शारीरिक नियंत्रण पर गहरा असर पड़ता है। प्रभावित व्यक्ति कई घंटों तक एक ही अवस्था में रह सकता है, उसकी प्रतिक्रिया क्षमता लगभग समाप्त हो जाती है, और बाहरी दुनिया से उसका संपर्क टूट जाता है। यही कारण है कि ऐसे लोग देखने में ‘जॉम्बी’ जैसे प्रतीत होते हैं, जिससे समाज में भय और असुरक्षा की भावना बढ़ रही है।

फेंटानिल पहले से ही अमेरिका में एक बड़े नशे के संकट का कारण बन चुका है, जहां इसके दुरुपयोग ने हजारों लोगों की जान ली है। अब इसके भारत, विशेषकर उत्तर भारत के शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में प्रवेश की आशंका ने स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था से जुड़े तंत्र को सतर्क कर दिया है। जाइलाज़ीन, जो मूल रूप से पशु चिकित्सा में उपयोग के लिए बनाया गया था, जब अवैध रूप से मानव उपभोग में इस्तेमाल होने लगता है, तो उसके प्रभाव और भी अनिश्चित और खतरनाक हो जाते हैं।

हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ जैसे राज्यों में हालिया घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह समस्या अब केवल पश्चिमी देशों तक सीमित नहीं रही। उत्तर भारत के युवा वर्ग में इस तरह के नशे की संभावित घुसपैठ एक गंभीर सामाजिक चुनौती बनती जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह एक बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले सकता है।

इस परिदृश्य में सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है जागरूकता और समयबद्ध कार्रवाई। समाज को यह समझना होगा कि नशा केवल एक व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि एक सामूहिक संकट है जो परिवार, समुदाय और आने वाली पीढ़ियों को प्रभावित करता है। युवाओं को सही जानकारी देना, स्कूलों और कॉलेजों में नशा-रोधी अभियानों को मजबूत करना और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर जिम्मेदार संवाद को बढ़ावा देना बेहद जरूरी हो गया है।

इसके साथ ही, कानून-व्यवस्था को सख्ती से लागू करना भी उतना ही आवश्यक है। अवैध रूप से इन ड्रग्स की सप्लाई और तस्करी में शामिल नेटवर्क्स पर कड़ी कार्रवाई करनी होगी। पुलिस, स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय से ही इस खतरे को नियंत्रित किया जा सकता है।

पुनर्वास केंद्रों की भूमिका भी इस लड़ाई में अहम है। नशे की गिरफ्त में आ चुके युवाओं को अपराधी नहीं, बल्कि मरीज के रूप में देखना और उन्हें सही इलाज व काउंसलिंग उपलब्ध कराना समाज की जिम्मेदारी है।

आज जरूरत है एक सामूहिक संकल्प की—जहां सरकार, समाज और हर नागरिक मिलकर इस खतरे के खिलाफ खड़े हों। ‘जॉम्बी ड्रग’ जैसी खतरनाक प्रवृत्तियों को जड़ से खत्म करने के लिए न केवल सख्त कानून, बल्कि संवेदनशील दृष्टिकोण भी जरूरी है।

यह समय है जागने का, समझने का और युवाओं को इस अंधेरे रास्ते से बचाने का—क्योंकि एक स्वस्थ और सुरक्षित समाज की नींव जागरूकता और जिम्मेदारी पर ही टिकी होती है।

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