महिला आरक्षण बिल से बदलेगा संसद का गणित: 33% सीटें महिलाओं के नाम, 850 तक बढ़ सकती है लोकसभा

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देश की राजनीति और प्रतिनिधित्व की दिशा को बदलने वाले एक महत्वपूर्ण कदम के तहत केंद्र सरकार ने 16 से 18 अप्रैल तक संसद का विशेष सत्र बुलाने का निर्णय लिया है, जिसमें महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाले कानून को लागू करने के लिए संशोधन विधेयक पेश किया जाएगा। इस पहल को प्रधानमंत्री Narendra Modi की प्राथमिकताओं में शामिल माना जा रहा है, जिन्होंने सभी दलों से इस मुद्दे पर सर्वसम्मति बनाने की अपील की है।

महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण की दिशा में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के रूप में जाना जाने वाला कानून वर्ष 2023 में संसद से पारित हो चुका था, लेकिन इसके क्रियान्वयन को 2029 के लोकसभा चुनावों से जोड़ दिया गया था। अब सरकार इस कानून को लागू करने की प्रक्रिया को स्पष्ट और संरचित बनाने के लिए संशोधन लाने जा रही है, जिससे आरक्षण की व्यवस्था को संवैधानिक रूप से मजबूती मिल सके।

इस विशेष सत्र में कानून मंत्री Arjun Ram Meghwal द्वारा प्रस्तावित विधेयकों के माध्यम से तीन प्रमुख पहलुओं पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। पहला, संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को लागू करने की समय-सीमा और प्रक्रिया को अंतिम रूप देना। दूसरा, लोकसभा सीटों की संख्या में वृद्धि का प्रावधान करना, और तीसरा, परिसीमन की प्रक्रिया को फिर से शुरू करने के लिए संवैधानिक अड़चनों को दूर करना।

प्रस्तावित संशोधन के अनुसार, लोकसभा की कुल सीटों की संख्या वर्तमान 543 से बढ़ाकर लगभग 850 तक की जा सकती है, जिनमें से 815 सीटें राज्यों के लिए और 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेशों के लिए निर्धारित होंगी। यह विस्तार केवल प्रतिनिधित्व बढ़ाने तक सीमित नहीं होगा, बल्कि इसका उद्देश्य जनसंख्या के वर्तमान आंकड़ों के अनुरूप संसदीय क्षेत्रों का पुनर्गठन भी है।

महिला आरक्षण की अवधि 15 वर्षों के लिए निर्धारित की गई है, जो 2029, 2034 और 2039 के आम चुनावों तक प्रभावी रहेगी। इस दौरान आरक्षित सीटों का रोटेशन किया जाएगा, ताकि देश के विभिन्न हिस्सों में महिलाओं को राजनीतिक अवसर मिल सके और प्रतिनिधित्व संतुलित बना रहे। इसके साथ ही अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग की महिलाओं के लिए भी आरक्षण का प्रावधान शामिल रहेगा, जिससे सामाजिक न्याय के दायरे को और व्यापक किया जा सके।

इस पूरी प्रक्रिया का एक अहम हिस्सा परिसीमन आयोग का गठन होगा, जो नए जनगणना आंकड़ों के आधार पर संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करेगा। प्रस्ताव है कि इस आयोग की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के किसी वर्तमान या सेवानिवृत्त न्यायाधीश द्वारा की जाएगी, जिससे प्रक्रिया की निष्पक्षता और विश्वसनीयता सुनिश्चित हो सके।

वर्तमान में देश में लोकसभा सीटों का निर्धारण 1971 की जनगणना के आधार पर किया गया था, और उसके बाद से परिसीमन पर संवैधानिक रोक लागू है। अब सरकार इस रोक को हटाने की दिशा में कदम बढ़ा रही है, ताकि बदलती जनसंख्या संरचना के अनुरूप प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके। यह कदम राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे विभिन्न राज्यों के बीच सीटों का संतुलन प्रभावित हो सकता है।

राजनीतिक दृष्टिकोण से यह विशेष सत्र केवल एक विधायी प्रक्रिया नहीं, बल्कि आने वाले चुनावी परिदृश्य का संकेत भी है। महिला मतदाताओं की बढ़ती भागीदारी और उनकी राजनीतिक भूमिका को देखते हुए यह कानून सभी दलों के लिए अहम मुद्दा बन चुका है। ऐसे में केंद्र सरकार इस विधेयक के माध्यम से एक व्यापक संदेश देना चाहती है कि महिलाओं की भागीदारी अब केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि संरचनात्मक रूप से सुनिश्चित की जाएगी।

हालांकि, विपक्ष की ओर से इस मुद्दे पर कुछ प्रक्रियात्मक और समय-सीमा से जुड़े सवाल उठाए जाने की संभावना है, विशेषकर इस बात को लेकर कि कानून को तत्काल लागू क्यों नहीं किया जा रहा। फिर भी, सरकार का रुख स्पष्ट है कि संवैधानिक प्रक्रियाओं और परिसीमन जैसे जटिल पहलुओं को ध्यान में रखते हुए यह चरणबद्ध कार्यान्वयन आवश्यक है।

कुल मिलाकर, 16 से 18 अप्रैल का यह विशेष सत्र भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। यदि यह संशोधन विधेयक पारित होता है, तो यह न केवल संसद और विधानसभाओं की संरचना को बदलेगा, बल्कि देश की राजनीतिक संस्कृति में महिलाओं की भूमिका को भी एक नए स्तर पर स्थापित करेगा।

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