हरियाणा में किसान आक्रोश चरम पर: नियमों, कटौती और मंडी व्यवस्था के खिलाफ सड़क पर उतरने की तैयारी

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हरियाणा में रबी सीजन के बीच किसान असंतोष अब खुलकर सामने आ रहा है। संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले विभिन्न किसान संगठनों ने 11 अप्रैल को राज्यभर में बड़े आंदोलन की चेतावनी दी है। इसके तहत हर जिले में एक राष्ट्रीय राजमार्ग को जाम करने का ऐलान किया गया है, जिससे साफ संकेत मिलता है कि किसान अब अपनी मांगों को लेकर निर्णायक संघर्ष के मूड में हैं।

किसानों के इस ऐलान के बाद प्रशासनिक मशीनरी भी सतर्क हो गई है। पुलिस मुख्यालय ने सभी जिलों को अलर्ट जारी करते हुए ट्रैफिक डायवर्जन योजना तैयार करने, पर्याप्त पुलिस बल तैनात करने और मंडियों के आसपास कड़ी निगरानी रखने के निर्देश दिए हैं। आशंका जताई जा रही है कि प्रदर्शन के दौरान असामाजिक तत्व माहौल बिगाड़ने की कोशिश कर सकते हैं, ऐसे में पुलिस को पहले से तैयार रहने को कहा गया है। साथ ही किसान नेताओं के साथ समन्वय बनाए रखने पर भी जोर दिया गया है, ताकि स्थिति नियंत्रण में रहे।

हालांकि किसान संगठनों ने स्पष्ट किया है कि आंदोलन के दौरान एंबुलेंस और अन्य आपातकालीन सेवाओं को बाधित नहीं किया जाएगा, लेकिन सामान्य यातायात को रोका जाएगा। इसके अलावा किसानों ने सुबह 11 बजे से दोपहर 3 बजे तक मंडियों में तौल बंद रखने का भी निर्णय लिया है, जिससे खरीद प्रक्रिया पर सीधा असर पड़ सकता है।

इस पूरे आंदोलन की जड़ में सरकार द्वारा लागू किए गए नए खरीद नियम हैं, जिनका किसान विरोध कर रहे हैं। किसानों का आरोप है कि ये नियम बिना उनकी सहमति के लागू किए गए हैं और इससे उनकी परेशानियां बढ़ी हैं। मंडियों में बायोमेट्रिक उपस्थिति, गेट पास और अन्य प्रक्रियाओं को किसानों ने अनावश्यक बोझ बताया है, जो उनके लिए समय और संसाधनों की बर्बादी बन रहे हैं।

किसान नेताओं का कहना है कि जहां एक ओर सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर गेहूं खरीद के लिए सख्त मानक लागू कर रही है, वहीं दूसरी ओर मंडियों में व्याप्त अनियमितताओं पर आंखें मूंदे हुए है। आधिकारिक तौर पर गेहूं में 12 से 13.5 प्रतिशत तक नमी और 0.75 प्रतिशत तक विदेशी पदार्थ की अनुमति है, जबकि क्षतिग्रस्त दानों की सीमा 4 प्रतिशत तय की गई है। लेकिन किसानों का आरोप है कि वास्तविकता में आढ़ती और दलाल मनमाने तरीके से नमी के नाम पर प्रति क्विंटल 3 से 5 किलोग्राम तक कटौती कर रहे हैं।

भाकियू (मान) के प्रदेशाध्यक्ष ठाकुर गुणीप्रकाश ने इस स्थिति को गंभीर बताते हुए कहा कि मंडियां किसानों के लिए “कसाईखाना” बनती जा रही हैं, जहां उनकी मेहनत का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा। उन्होंने आरोप लगाया कि अघोषित आढ़ती और बिचौलिये किसानों की मजबूरी का फायदा उठा रहे हैं, जबकि सरकारी तंत्र इस पर चुप्पी साधे हुए है।

किसानों का यह भी कहना है कि एमएसपी 2585 रुपये प्रति क्विंटल घोषित होने के बावजूद उन्हें पूरा भुगतान नहीं मिल पा रहा, क्योंकि कटौती और तकनीकी शर्तों के नाम पर उनकी उपज का मूल्य घटा दिया जाता है। साथ ही, खरीद प्रक्रिया के लिए अनिवार्य किए गए दस्तावेज और पंजीकरण प्रक्रिया भी कई छोटे किसानों के लिए मुश्किल साबित हो रही है।

इस बीच सरकार की ओर से यह तर्क दिया जा रहा है कि ये नियम गुणवत्ता सुनिश्चित करने और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए बनाए गए हैं। अधिकारियों का कहना है कि गेहूं की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए नमी और अन्य मानकों का पालन जरूरी है, ताकि भंडारण और वितरण में कोई समस्या न आए। लेकिन किसानों का कहना है कि नियमों का पालन एकतरफा तरीके से उन पर थोपा जा रहा है, जबकि मंडी स्तर पर हो रही गड़बड़ियों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती।

वर्तमान स्थिति ने हरियाणा की कृषि अर्थव्यवस्था में एक असंतुलन पैदा कर दिया है, जहां एक ओर सरकार डिजिटल और मानकीकृत प्रणाली की ओर बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर किसान खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

आने वाले दिनों में 11 अप्रैल का प्रस्तावित आंदोलन इस असंतोष की तीव्रता को और स्पष्ट करेगा। यह केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि किसानों की उस पीड़ा का प्रतीक है, जो मंडी व्यवस्था, नियमों की जटिलता और बाजार में व्याप्त असमानताओं के बीच फंसी हुई है। अब देखना यह होगा कि सरकार इस आंदोलन को केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा मानती है या इसे किसानों के वास्तविक संकट के रूप में समझते हुए ठोस समाधान की दिशा में कदम उठाती है।

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