हरियाणा में बेटियों की संख्या पर फिर चिंता: जन्म के समय लिंगानुपात 900 पर पहुंचा, कई जिलों में तेज गिरावट

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हरियाणा में बेटियों के जन्म को लेकर वर्षों से चल रही मुहिम के बीच सामने आए ताजा आंकड़ों ने एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है। जनवरी से जून 2026 के बीच राज्य में जन्म के समय लिंगानुपात यानी Sex Ratio at Birth (SRB) घटकर 900 बेटियां प्रति 1,000 लड़कों पर पहुंच गया है। यह आंकड़ा पिछले कुछ वर्षों की तुलना में गिरावट को दर्शाता है और राज्य सरकार के सामने एक गंभीर सामाजिक चुनौती खड़ी करता है।

विधानसभा में रखे गए आंकड़ों के अनुसार, हरियाणा का जन्म के समय लिंगानुपात वर्ष 2025 में 923 और 2024 में 910 था। इस लिहाज से 2026 के शुरुआती छह महीनों में दर्ज 900 का आंकड़ा विशेष रूप से चिंता पैदा करता है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक यह पिछले करीब आठ वर्षों में राज्य का सबसे कमजोर स्तर है।

हरियाणा के लिए यह गिरावट इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य लंबे समय से कन्या भ्रूण हत्या और लिंग चयन जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ देशव्यापी अभियान के केंद्र में रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2015 में पानीपत से ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान की शुरुआत की थी। इसके बाद हरियाणा ने जन्म के समय लिंगानुपात सुधारने को अपनी प्रमुख सामाजिक प्राथमिकताओं में शामिल किया।

हाल के वर्षों में राज्य ने इस मोर्चे पर उल्लेखनीय सुधार का दावा किया था। ऐसे में 2026 के शुरुआती आंकड़ों में आई गिरावट ने यह सवाल खड़ा किया है कि क्या पिछले वर्षों में हासिल सुधारों को बनाए रखना अब चुनौती बन रहा है।

सबसे ज्यादा चिंता कुछ जिलों के आंकड़ों को लेकर है। चरखी दादरी में जन्म के समय लिंगानुपात 2025 के 913 से गिरकर जनवरी-जून 2026 में 829 रह गया। यानी एक साल के भीतर इस जिले में 84 अंकों की गिरावट दर्ज की गई। पानीपत में भी स्थिति चिंताजनक रही, जहां लिंगानुपात 951 से घटकर 880 हो गया।

जिंद, अंबाला और गुरुग्राम सहित कई अन्य जिलों में भी गिरावट दर्ज की गई है। हालांकि तस्वीर पूरे राज्य में एक जैसी नहीं है। कुछ जिलों ने बेहतर प्रदर्शन किया है और वहां जन्म के समय लड़कियों की संख्या में सुधार देखने को मिला है। पलवल, फरीदाबाद और करनाल ऐसे जिलों में शामिल हैं जहां आंकड़ों में सुधार दर्ज किया गया।

जिलावार आंकड़े यह संकेत देते हैं कि समस्या केवल राज्य स्तर की नहीं है, बल्कि कुछ विशेष क्षेत्रों में सामाजिक व्यवहार, स्वास्थ्य सेवाओं और निगरानी व्यवस्था की अलग-अलग चुनौतियां हो सकती हैं। इसलिए विशेषज्ञों और प्रशासन के लिए यह जरूरी होगा कि वे केवल राज्य के औसत आंकड़े पर ध्यान देने के बजाय उन जिलों की पहचान करें जहां गिरावट सबसे अधिक है।

राज्य सरकार ने कहा है कि लिंग चयन और भ्रूण हत्या पर रोक लगाने के लिए लागू कानूनों के तहत कार्रवाई को मजबूत किया जा रहा है। सरकार के अनुसार PCPNDT और MTP कानूनों के तहत कार्रवाई की गई है और अब तक 1,422 FIR दर्ज की जा चुकी हैं। इसके अलावा जागरूकता रैलियों, नुक्कड़ नाटकों, जनसभाओं और अन्य अभियानों के जरिए लोगों की सोच बदलने की कोशिश की जा रही है।

महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रुति चौधरी ने भी आंकड़ों में अचानक आई गिरावट को गंभीरता से लेते हुए तथ्यात्मक जांच के निर्देश दिए हैं। इस जांच का उद्देश्य यह समझना है कि किन जिलों में गिरावट हुई, इसके पीछे वास्तविक कारण क्या हैं और सरकारी निगरानी तथा कानूनों के क्रियान्वयन में कहीं कोई कमी तो नहीं रही।

इस पूरे मामले में केवल आंकड़े देखना पर्याप्त नहीं होगा। जन्म के समय लिंगानुपात कई सामाजिक और प्रशासनिक कारकों से प्रभावित हो सकता है। जन्म पंजीकरण की प्रक्रिया, स्वास्थ्य संस्थानों में रिकॉर्डिंग, गर्भावस्था के दौरान जांच की निगरानी और लिंग चयन पर प्रतिबंधों का प्रभाव—इन सभी पहलुओं की जांच जरूरी है।

साथ ही, यह भी समझना होगा कि कानून केवल समस्या के एक हिस्से को संबोधित कर सकता है। बेटियों के प्रति सामाजिक सोच में बदलाव उतना ही महत्वपूर्ण है। परिवारों में लड़के और लड़की के बीच भेदभाव, दहेज जैसी सामाजिक कुरीतियां और बेटे को आर्थिक सुरक्षा से जोड़ने वाली मानसिकता आज भी चुनौती बनी हुई हैं।

हरियाणा के लिए मौजूदा आंकड़े एक चेतावनी की तरह हैं। यदि कुछ जिलों में गिरावट अस्थायी प्रशासनिक या आंकड़ा-संबंधी कारणों से है, तो उसे स्पष्ट करना होगा। यदि इसके पीछे लिंग चयन जैसी गैरकानूनी गतिविधियों की भूमिका है, तो निगरानी और कार्रवाई को और मजबूत करना होगा।

सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह पहले हासिल सुधारों को केवल आंकड़ों तक सीमित न रहने दे। स्कूलों, पंचायतों, स्वास्थ्य केंद्रों, आंगनवाड़ी नेटवर्क और स्थानीय प्रशासन को जोड़कर व्यापक सामाजिक अभियान चलाने की जरूरत होगी।

हरियाणा ने कभी देश को यह संदेश दिया था कि सामाजिक सोच और सरकारी इच्छाशक्ति मिलकर जन्म के समय लिंगानुपात में सुधार ला सकती है। अब 900 का आंकड़ा उसी उपलब्धि को बनाए रखने की परीक्षा है।

आने वाले महीनों में सरकार द्वारा की जाने वाली जांच और जिलावार कार्रवाई यह तय करेगी कि मौजूदा गिरावट एक अस्थायी उतार है या राज्य में बेटियों के जन्म से जुड़ी पुरानी सामाजिक चुनौती फिर से गंभीर रूप ले रही है।

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