हरियाणा विधानसभा का शोरगुल भरा दूसरा दिन:  हंगामा, बहस और अविश्वास की सियासत

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हरियाणा विधानसभा का दूसरा सत्र दिन सोशल मीडिया और विधानसभा गलियारों में लंबे समय तक चर्चा का विषय बना रहा। सुबह से ही सदन का वातावरण गरम था और जैसे ही चर्चा का क्रम बढ़ा, विपक्ष और सत्तापक्ष के बीच वैचारिक मतभेद राजनीतिक शोर-शराबे तक पहुंच गए। यह दिन सिर्फ विरोधी शब्दों का आदान-प्रदान नहीं रहा, बल्कि बहस, नारेबाजी, मार्शल का हस्तक्षेप और अविश्वास प्रस्ताव की राजनीति के कारण इसे विधानसभा के इतिहास के “अतिशोरयुक्त” दिनों में शुमार किया गया।

मुख्य विवाद का केंद्र इस दिन वंदे भारत के मुद्दे पर हुई चर्चा थी। विपक्ष ने सरकार पर आरोप लगाया कि वह भावनात्मक विषयों को उठाकर असली जनहित के मुद्दों से ध्यान भटका रही है। कांग्रेस एवं अन्य विपक्षी विधायकों ने कहा कि सरकार को अपनी प्राथमिकता किसानों, बेरोजगारी और स्वास्थ्य सेवाओं पर केंद्रित करनी चाहिए, न कि वंदे भारत जैसे प्रतीकात्मक विषयों को हथियार बनाकर। भाषणों की शुरुआत भले ही गंभीर बहस से हुई, लेकिन कुछ ही समय में उसका स्वर बदल गया और सदन के बीचों-बीच नारेबाजी शुरू हो गई।

जब विपक्षी विधायकों ने अधिक जोर से आवाज़ उठाई, तो सदन की मर्यादा बनाए रखने के लिए मार्शलों को हस्तक्षेप करना पड़ा। मार्शलों द्वारा कई बार कांग्रेस विधायकों को समझाने की कोशिश की गई, लेकिन जब स्थिति नियंत्रण से बाहर हुई, तो कई कांग्रेस सदस्यों को सदन से बाहर ले जाना पड़ा। इसके दौरान कुछ विधायकों और मार्शलों के बीच धक्का-मुक्की जैसे दृश्य भी देखने को मिले, जिससे सदन का माहौल और तनावपूर्ण हो गया।

सदन में उठे शब्दों की तीव्रता ने यह संकेत दिया कि विपक्ष और सत्तापक्ष के बीच वैचारिक दूरी पहले से कहीं अधिक बढ़ चुकी है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने आरोप लगाया कि विधानसभा की कार्यवाही को जानबूझकर बाधित किया जा रहा है और लोकतांत्रिक बहस की जगह अराजकता को बढ़ावा दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यह रवैया हरियाणा के लोगों के प्रति असम्मान है और सत्ता पक्ष विवादों में उलझकर जनता की समस्याओं को टालने की कोशिश कर रहा है।

दूसरी ओर सत्तापक्ष का तर्क था कि विपक्ष सदन को सिर्फ शोरगुल से भरना चाहता है और असल मुद्दों पर ठोस बहस से भाग रहा है। नियमों के उल्लंघन पर सख्ती से कार्रवाई की आवश्यकता बताते हुए सरकार के नेताओं ने कहा कि सदन की मर्यादा के भीतर विमर्श होना चाहिए, न कि कोई भी अत्यधिक नारेबाज़ी या अवरोध। इन चर्चाओं के बीच कई बार अध्यक्ष को भी सदन की कार्यवाही को नियंत्रित करने में कठिनाई का सामना करना पड़ा।

इस शोरगुल के बीच विधानसभा में विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव को भी प्रस्तुत किया। अविश्वास प्रस्ताव को लेकर कांग्रेस एवं सहयोगी दलों का कहना है कि सरकार की नीतियों और फैसलों के कारण जनभावना में असंतोष है, और उन्हें हटाने का तरीका यही है कि सदन में स्पष्ट बहुमत यह दिखा दे कि सरकार लोगों के विश्वास पर खड़ी नहीं है। विपक्ष की रणनीति थी कि अविश्वास प्रस्ताव उठाकर सरकार को इस्तीफे के मोड़ पर ले जाया जाए। हालांकि सरकार ने इसे राजनीतिक चाल और विरोधी दलों के संघर्ष के रूप में पेश करते हुए इसके पक्ष में बहस को टालने का प्रयास किया।

विपक्ष का यह भी तर्क रहा कि सरकार ने मनरेगा कार्यों, किसानों के कर्ज़, रोजगार के अवसरों और स्थानीय स्तर पर उत्पन्न समस्याओं पर संवेदनशीलता नहीं दिखाई। इसीलिए सारा मुद्दा केवल प्रतीकात्मक विषयों जैसे वंदे भारत तक सीमित कर दिया गया है, जो आम जनता की प्राथमिकताओं से काफी अलग है। कांग्रेस नेताओं का जोर रहा कि विधानसभा में वास्तविक मुद्दों पर चर्चा से भागना जनता को गुमराह करने जैसा है।

सत्तापक्ष के नेताओं ने भी दिन भर कई समय जनता के हित में उठाए गए मुद्दों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि सरकार ने कई कल्याणकारी निर्णय लिए हैं, जो कृषि, शिक्षा और सड़क सुरक्षा तक फैले हुए हैं। ऐसे में विपक्ष का हर विषय को राजनीतिक आरोपों में बदल देना असंतुलित राजनीति को दर्शाता है, जो शासन की सकारात्मक पहल को नहीं समझ पा रहा है।

सत्र का यह भाग केवल राजनीतिक बयानबाज़ी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इससे हरियाणा की लोकतांत्रिक संस्कृति, विधान सभा के अंदर संवाद के तरीकों और सत्ता-विरोधी संतुलन की जटिलता भी उभर कर सामने आई है। जो राजनीति केवल नारेबाज़ी और धक्का-मुक्की में उलझती है, वह लंबे समय तक जनता का भरोसा अर्जित नहीं कर सकती। वहीं एक मजबूत लोकतंत्र में बहस और विवाद दोनों का होना स्वाभाविक है, बशर्ते वह मर्यादित और संविधान की सीमाओं के भीतर हो।

दिन के समापन पर यह स्पष्ट हो गया कि विधानसभा केवल सरकार और विपक्ष के बीच सत्ता का अखाड़ा भर नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र के मूल तत्व — बहस, आलोचना, जवाबदेही और समाधान — का मंच भी है। हालांकि दिन भर चले हंगामे ने सुगम बहस को बाधित किया, पर यह भी संकेत दिया कि राजनीतिक दलों के बीच संतुलन, संवाद की भूख और लोकतांत्रिक सभ्यता पर विश्वास कितना मजबूत और कितना कमजोर है।

अगले दिनों की कार्यवाही में जनता की उम्मीद यह है कि सदन का उद्देश्य केवल राजनीतिक शोर नहीं रहेगा, बल्कि वास्तविक मुद्दों पर ठोस चर्चा और समाधान की दिशा में आगे बढ़ेगा। यही लोकतांत्रिक प्रक्रिया की असली परीक्षा है — जहां सत्ता और विरोध दोनों ही अपने दायित्वों को पूरा करें और जनता का विश्वास बनाए रखें।

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