48 हजार घर, 14 साल का इंतज़ार: जेएनएनयूआरएम फ्लैट घोटाले पर केंद्र सख्त, AAP सरकार की भूमिका की होगी जांच

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केंद्र सरकार ने राजधानी दिल्ली में गरीबों के लिए बनाए गए हजारों मकानों के वर्षों तक खाली पड़े रहने के मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच के संकेत दिए हैं। केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्री मनोहर लाल ने सोमवार को राज्यसभा में कहा कि जवाहरलाल नेहरू नेशनल अर्बन रिन्यूअल मिशन (JNNURM) के तहत निर्मित लगभग 48,000 फ्लैटों को अब तक वंचित वर्ग को आवंटित न किए जाने के पीछे की वजहों की पड़ताल के सुझावों पर केंद्र सरकार विचार करेगी। इस बयान ने दिल्ली की पूर्व आम आदमी पार्टी सरकार की नीतियों और मंशा पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

राज्यसभा के प्रश्नकाल के दौरान एक पूरक प्रश्न का उत्तर देते हुए मनोहर लाल ने बताया कि ये फ्लैट वर्ष 2012 में केंद्र और तत्कालीन राज्य सरकार की साझेदारी से बनाए गए थे, ताकि झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले गरीब परिवारों को सम्मानजनक आवास मिल सके। उन्होंने कहा कि यह बेहद चौंकाने वाला है कि इतनी बड़ी संख्या में बने मकान आम आदमी पार्टी की सरकार के दौरान जरूरतमंदों को आवंटित ही नहीं किए गए। मंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि लंबे समय तक खाली पड़े रहने के कारण इन फ्लैटों की हालत इतनी खराब हो चुकी है कि कई यूनिट अब रहने लायक भी नहीं बची हैं।

इस मुद्दे को सदन में उठाते हुए सांसद स्वाति मालीवाल ने दावा किया कि कुल 52,344 फ्लैटों में से केवल 4,871 फ्लैट ही गरीबों को दिए गए, जबकि शेष हजारों मकान वर्षों तक खाली पड़े रहे। उन्होंने आरोप लगाया कि तत्कालीन AAP सरकार ने वोट बैंक की राजनीति के चलते इन घरों का आवंटन नहीं किया, क्योंकि वह इसका पूरा राजनीतिक श्रेय खुद लेना चाहती थी। मालीवाल ने सवाल किया कि क्या इस लापरवाही और कथित राजनीतिक स्वार्थ के लिए जिम्मेदार लोगों को सजा दी जाएगी और क्या केंद्र सरकार इन जर्जर मकानों की मरम्मत के लिए ठोस योजना बनाएगी।

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल ने कहा कि दोषियों के खिलाफ कार्रवाई और सजा देने के सुझाव पर गंभीरता से विचार किया जाएगा। उन्होंने यह भी बताया कि भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली मौजूदा दिल्ली सरकार ने इन फ्लैटों की मरम्मत और पुनर्विकास के लिए पहल शुरू कर दी है, ताकि इन्हें जल्द से जल्द झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले गरीब परिवारों को सौंपा जा सके। जो मकान पूरी तरह से रहने योग्य नहीं हैं, उनकी तकनीकी जांच कराई जाएगी और आगे की कार्रवाई उसी आधार पर की जाएगी।

यह मामला केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है, बल्कि हरियाणा और पूरे एनसीआर क्षेत्र के लिए भी एक अहम संकेत है, जहां शहरीकरण के दबाव के बीच गरीबों के लिए आवास एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय पर ये मकान आवंटित कर दिए गए होते, तो हजारों परिवारों को सम्मानजनक जीवन मिल सकता था और सरकारी संसाधनों की बर्बादी भी रोकी जा सकती थी।

14 साल बाद केंद्र का यह सख्त रुख न सिर्फ शहरी आवास योजनाओं की विफलताओं को उजागर करता है, बल्कि यह भी बताता है कि सामाजिक कल्याण की योजनाएं राजनीतिक खींचतान की भेंट चढ़ें तो उसका खामियाजा सबसे गरीब तबके को भुगतना पड़ता है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जांच के बाद क्या वास्तव में जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होती है और क्या वर्षों से बंद पड़े ये घर आखिरकार जरूरतमंदों के आशियाने बन पाएंगे।

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