जूते उतारकर निकला छात्र नेता, संगठन का टिकट नहीं मिला तो निर्दलीय लड़ा; दीपांशु शौकीन ने DUSU में रचा इतिहास

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नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव 2026 में दीपांशु शौकीन की जीत ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि बड़े छात्र संगठनों के प्रभाव वाले चुनाव में क्या कोई उम्मीदवार केवल अपने मुद्दों और व्यक्तिगत जनसंपर्क के आधार पर भी मजबूत समर्थन हासिल कर सकता है। शौकीन ने डूसू के उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीत दर्ज की और केंद्रीय पैनल में किसी छात्र संगठन के समर्थन के बिना चुने जाने वाले उम्मीदवारों की परंपरा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण पेश किया। उपलब्ध चुनाव परिणामों के अनुसार उन्हें 30,615 वोट मिले, जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी ABVP के इशु मौर्य को 16,910 वोट मिले।

शौकीन की कहानी इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि उनका चुनाव प्रचार पारंपरिक छात्र राजनीति से काफी अलग दिखाई दिया। वह पहले NSUI से जुड़े थे और संगठन से टिकट की उम्मीद कर रहे थे। नामांकन के बाद उन्हें अपना नाम वापस लेने के लिए कहा गया, लेकिन उन्होंने चुनाव मैदान छोड़ने के बजाय निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने का फैसला किया। इस घटनाक्रम की अंदरूनी वजहों को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं, इसलिए उनके बारे में किसी एक पक्ष की व्याख्या को अंतिम तथ्य मानना उचित नहीं होगा। इतना स्पष्ट है कि शौकीन ने संगठन का टिकट नहीं मिलने के बाद भी अपना अभियान जारी रखा।

उनके अभियान का सबसे अलग दृश्य सत्य निकेतन की उस त्रासदी के बाद सामने आया, जिसमें 6 सितंबर को एक बहुमंजिला PG इमारत गिरने से सात लोगों की मौत हुई थी। इनमें दिल्ली विश्वविद्यालय के पांच छात्र भी शामिल थे। इस घटना के बाद शौकीन ने जूते-चप्पल छोड़कर नंगे पैर चलने का संकल्प लिया और छात्र सुरक्षा, हॉस्टल तथा विश्वविद्यालय के बुनियादी ढांचे को अपने अभियान के प्रमुख मुद्दों में शामिल किया। उन्होंने कहा कि नंगे पैर चलने की शारीरिक परेशानी उन्हें लगातार छात्रों की समस्याओं की याद दिलाती रही।

यही मुद्दे उनके चुनाव अभियान की पहचान बन गए। उनके पोस्टर और संदेशों में हॉस्टल की कमी, छात्र सुरक्षा और विश्वविद्यालय के बुनियादी ढांचे जैसे विषय प्रमुख रहे। चुनाव जीतने के बाद भी उन्होंने कहा कि वह छात्रों की समस्याओं को उठाने के लिए काम करेंगे और विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने इन मुद्दों को रखने की दिशा में आगे बढ़ेंगे।

इस जीत का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि डूसू का केंद्रीय पैनल लंबे समय से बड़े छात्र संगठनों के बीच मुकाबले का प्रमुख मंच रहा है। इस बार ABVP ने अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव के तीन पद जीते, जबकि उपाध्यक्ष पद निर्दलीय दीपांशु शौकीन के खाते में गया। चुनाव में कुल मतदान प्रतिशत 40.46 रहा, जो पिछले तीन वर्षों में सबसे अधिक बताया गया है।

शौकीन की व्यक्तिगत पृष्ठभूमि भी उनके अभियान की कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वह पश्चिमी दिल्ली के पीरागढ़ी क्षेत्र से आते हैं। उनके पिता दिल्ली परिवहन निगम में बस कंडक्टर हैं और उनकी मां आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं। उन्होंने शहीद भगत सिंह कॉलेज से राजनीति विज्ञान में स्नातक किया और वर्तमान में बौद्ध अध्ययन विभाग में मास्टर डिग्री कर रहे हैं।

उनकी जीत का एक और उल्लेखनीय पहलू वोटों का अंतर है। शौकीन को मिले 30,615 वोट राष्ट्रपति पद पर विजयी उम्मीदवार को मिले 24,576 वोटों से भी अधिक थे। हालांकि अलग-अलग पदों के चुनाव में मतदाता व्यवहार की तुलना सीधे तौर पर करना उचित नहीं है, लेकिन यह आंकड़ा बताता है कि उपाध्यक्ष पद के मुकाबले में शौकीन को व्यापक समर्थन मिला।

क्या इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि चुनाव जीतने का एक निश्चित फार्मूला मिल गया है? ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन 2026 के डूसू परिणाम में एक बात स्पष्ट रूप से दिखाई देती है—उम्मीदवार का मुद्दों से जुड़ाव, लगातार जमीनी संपर्क और मतदाताओं के बीच अपनी स्वतंत्र पहचान बनाना संगठनात्मक समर्थन के बाहर भी चुनावी समर्थन जुटाने में भूमिका निभा सकता है। शौकीन ने खुद कहा कि उनके अभियान को छात्रों ने चलाया और उन्हें विभिन्न वर्गों के छात्रों का समर्थन मिला। यह उनका व्यक्तिगत आकलन है; चुनाव परिणाम इसका एक मापनीय हिस्सा जरूर दिखाते हैं, लेकिन इससे भविष्य के चुनावों के लिए कोई सार्वभौमिक नियम तय नहीं किया जा सकता।

दीपांशु शौकीन की कहानी का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है कि चुनाव केवल पोस्टर, संगठन और संसाधनों का मुकाबला नहीं होते। मतदाता किसी उम्मीदवार के मुद्दों, उसकी सार्वजनिक मौजूदगी, उसके व्यवहार और उसके वादों को अलग-अलग तरीके से देखते हैं। लेकिन अंतिम फैसला हमेशा मतदाताओं का होता है। डूसू 2026 में शौकीन के मामले में परिणाम ने दिखाया कि एक निर्दलीय उम्मीदवार भी बड़े संगठनों के बीच अपनी जगह बना सकता है, यदि वह पर्याप्त संख्या में मतदाताओं का विश्वास हासिल कर पाए।

अब असली परीक्षा चुनाव परिणाम के बाद शुरू होती है। जिन छात्र मुद्दों को लेकर दीपांशु शौकीन ने अभियान चलाया, उनमें हॉस्टल, सुरक्षा और विश्वविद्यालय के बुनियादी ढांचे जैसे सवाल शामिल हैं। उनकी राजनीतिक यात्रा का अगला अध्याय इस बात से तय होगा कि वह इन मुद्दों को निर्वाचित प्रतिनिधि के रूप में किस तरह उठाते हैं और छात्रों के सामने अपने चुनावी वादों के प्रति कितनी जवाबदेही दिखाते हैं।

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