नई दिल्ली। : भारत की चुनावी व्यवस्था में मतदाता सूची केवल एक प्रशासनिक दस्तावेज नहीं है। यही वह आधार है जो तय करता है कि चुनाव में कौन मतदान कर सकता है और किस नागरिक का नाम मतदाता सूची में दर्ज है। ऐसे में मतदाता सूची तैयार करने, उसमें नाम जोड़ने, हटाने या सुधार करने की प्रक्रिया पर नियंत्रण का सवाल सीधे लोकतांत्रिक अधिकार और चुनावी संस्थाओं की विश्वसनीयता से जुड़ जाता है।
इसी संदर्भ में Election Commission of India की Director General (IT) डॉ. सीमा खन्ना की भूमिका इन दिनों चर्चा के केंद्र में है। भारतीय निर्वाचन आयोग की आधिकारिक अधिकारी सूची में उन्हें DG (IT) के रूप में दर्ज किया गया है। हाल की रिपोर्टों के अनुसार, वह ECI के ECINet और मतदाता सूची से संबंधित तकनीकी ढांचे की जिम्मेदारी संभालने वाले महत्वपूर्ण अधिकारियों में हैं।
विवाद सीमा खन्ना के पद पर होने भर को लेकर नहीं है। असली सवाल उस तकनीकी व्यवस्था को लेकर है जिसके माध्यम से देश की मतदाता सूचियों का प्रबंधन किया जा रहा है और यह कि इस व्यवस्था में मैदान में काम करने वाले वैधानिक चुनाव अधिकारियों की स्वतंत्र भूमिका कितनी सुरक्षित है।

Indian Express की एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, Election Commissioners Sukhbir Singh Sandhu और Vivek Joshi ने ECINet में मतदाता सूची के डेटाबेस के क्रमिक केंद्रीकरण तथा Electoral Registration Officers यानी EROs की पहुंच और अधिकारों को लेकर गंभीर आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों Election Commissioners ने Chief Election Commissioner Gyanesh Kumar को भी इस संबंध में अपने नोट भेजे थे।
यहीं से लोकतांत्रिक व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है।
कानून के तहत मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और संशोधन की प्रक्रिया में EROs की भूमिका निर्धारित है। लेकिन यदि किसी तकनीकी प्लेटफॉर्म की संरचना ऐसी हो जाए कि स्थानीय स्तर पर कानून के तहत निर्णय लेने वाले अधिकारी उस निर्णय को सिस्टम में दर्ज या लागू ही न कर सकें, तो सवाल केवल IT management का नहीं रह जाता। यह सवाल बन जाता है कि वास्तविक निर्णय लेने की शक्ति आखिर किस स्तर पर केंद्रित हो रही है।
Indian Express ने गोवा का एक मामला भी सामने रखा है, जहां रिपोर्ट के अनुसार EROs ने 97 मतदाताओं को शामिल करने के पक्ष में निर्णय लिया था, लेकिन उनके नामों को मतदाता सूची में दर्ज करने में ECINet से जुड़ी तकनीकी और access-related बाधाएं सामने आईं। रिपोर्ट के मुताबिक, Goa CEO कार्यालय ने इस संबंध में कई बार आयोग से संपर्क किया और Deputy Election Commissioner Sanjay Kumar ने भी DG (IT) को लिखा कि IT system को EROs के वैधानिक निर्णयों के रास्ते में बाधा नहीं बनना चाहिए।
यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि तकनीक का इस्तेमाल चुनावी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाने के लिए किया जाना चाहिए, न कि वैधानिक अधिकारियों की भूमिका को कमजोर करने के लिए।
विडंबना यह है कि ECINet को स्वयं Election Commission ने पारदर्शिता, विश्वसनीयता और जनता के विश्वास को बढ़ाने वाला एक व्यापक तकनीकी प्लेटफॉर्म बताया था। आयोग की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, ECINet को देश की चुनावी सेवाओं से जुड़े 40 से अधिक apps और portals को एकीकृत करने के उद्देश्य से विकसित किया गया है।
लेकिन अब विवाद इस बात पर है कि centralized technology और decentralized statutory responsibility के बीच संतुलन कैसे कायम रखा जाए।
यहां किसी अधिकारी के खिलाफ व्यक्तिगत निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। सीमा खन्ना की भूमिका को लेकर जो सवाल सामने आए हैं, वे मुख्यतः उनके विभाग की तकनीकी जिम्मेदारियों और ECINet के संचालन से जुड़े हैं। Indian Express की रिपोर्ट में उठाए गए सवाल भी इसी institutional structure और access control पर केंद्रित हैं। वहीं उपलब्ध रिपोर्टों में यह भी दर्ज है कि खन्ना की ओर से इन आरोपों पर प्रतिक्रिया मांगी गई थी, लेकिन रिपोर्ट प्रकाशित होने तक जवाब नहीं मिला था।
एक और तथ्य को स्पष्ट करना जरूरी है। सोशल मीडिया या राजनीतिक दावों में सीमा खन्ना को गृह मंत्रालय से जोड़कर पेश किया जा सकता है, लेकिन उपलब्ध विश्वसनीय रिकॉर्ड उन्हें ECI की DG (IT) बताते हैं और उनकी पूर्व सेवा NIC से जुड़ी बताई गई है। NIC, Ministry of Electronics and Information Technology के अधीन है, गृह मंत्रालय के नहीं। इसलिए किसी badge, ribbon या पहचान-पत्र के आधार पर उनके बारे में गृह मंत्रालय से सीधा संबंध स्थापित करना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।
फिर भी व्यापक संस्थागत प्रश्न अपनी जगह बेहद गंभीर है।
भारत जैसे लोकतंत्र में चुनाव आयोग की विश्वसनीयता केवल चुनाव के दिन मतदान कराने से तय नहीं होती। यह इस बात से भी तय होती है कि मतदाता सूची कैसे तैयार होती है, किसका नाम जोड़ा जाता है, किसका नाम हटाया जाता है, स्थानीय चुनाव अधिकारियों के पास कितना अधिकार रहता है और तकनीकी प्रणाली उनके निर्णयों को लागू करने में सक्षम है या नहीं।
यदि किसी नागरिक का नाम केवल इसलिए मतदाता सूची से बाहर रह जाए क्योंकि किसी software system में उसे वापस जोड़ने की शक्ति स्थानीय वैधानिक अधिकारी के पास नहीं है, तो यह तकनीकी त्रुटि से कहीं बड़ा लोकतांत्रिक प्रश्न बन जाता है।
इसीलिए Election Commission के भीतर से उठे सवालों को राजनीतिक आरोप कहकर खारिज करने के बजाय संस्थागत स्तर पर स्पष्ट जवाब देना आवश्यक है। किसके पास database का अंतिम operational control है? ERO के निर्णय को कौन override कर सकता है? किसी गलत deletion को वापस जोड़ने की प्रक्रिया क्या है? क्या हर ERO अपने वैधानिक अधिकारों का स्वतंत्र रूप से इस्तेमाल कर सकता है? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या चुनावी database की तकनीकी architecture कानून में निर्धारित जिम्मेदारियों के अनुरूप है?
इन सवालों के स्पष्ट और सार्वजनिक उत्तर लोकतंत्र के हित में हैं।
चुनाव किसी सरकार, किसी पार्टी या किसी अधिकारी की संपत्ति नहीं होते। वे नागरिकों के संवैधानिक अधिकार का माध्यम हैं। इसलिए मतदाता सूची पर भरोसा लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी शर्त है।
आज ECINet को लेकर उठे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि तकनीक कितनी भी आधुनिक क्यों न हो, चुनावी प्रक्रिया में अंतिम प्राथमिकता कानून, संस्थागत जवाबदेही और मतदाता के अधिकार की होनी चाहिए।
यही वह कसौटी है जिस पर आने वाले दिनों में ECINet, उसके operational controls और चुनाव आयोग के भीतर उठे इन सवालों का जवाब देश को देना होगा।
