टोल प्लाजा पर हो रही हिंसक घटनाएं और सरकार का दोहरा रवैया

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देशभर में आए दिन टोल प्लाज़ाओं पर ऐसी घटनाएँ सामने आती हैं जहाँ नेशनल हाइवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) के ठेकेदारों या टोल कर्मियों द्वारा आम जनता के साथ दुर्व्यवहार किया जाता है। कई बार यह विवाद इतना बढ़ जाता है कि यात्रियों को शारीरिक चोटें लगती हैं, जिनमें कुछ मामलों में स्थिति गंभीर हो चुकी है और जान तक पर बन आई है। सवाल यह है कि जब यह घटनाएँ बार-बार सामने आ रही हैं, तब केंद्र सरकार और ख़ास तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने अब तक कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाया? क्यों टोल एजेंसियों या ठेकेदारों के खिलाफ कार्रवाई का कोई संदेश जनता तक नहीं पहुँचता? यह चुप्पी आखिर किसकी सुरक्षा करती है – जनता की या फिर टोल माफ़िया की?

वास्तविकता यह है कि सड़क पर यात्रा करने वाला आम नागरिक बार-बार ऐसी घटनाओं का शिकार बनता है। टोल पर वसूली की प्रक्रिया पहले ही विवादों में घिरी रहती है, ऊपर से अगर टोल कर्मचारी कानून अपने हाथ में लेकर यात्रियों को पीटने लगें, तो यह व्यवस्था नागरिक अधिकारों का खुला उल्लंघन है। दुर्भाग्य यह है कि अब तक न तो NHAI ने ऐसी घटनाओं पर सख़्त कार्रवाई की है और न ही केंद्र सरकार ने कोई ऐसा कानून या निर्देश जारी किया है जो इस तरह की गुंडागर्दी को रोक सके। इसके उलट, जिन लोगों पर सुरक्षा देने की ज़िम्मेदारी है, वही चुप्पी साध लेते हैं।
ताजा मामला मेरठ के भूनी टोल प्लाजा का है, जहां 17 अगस्त 2025 को सेना के जवान कपिल सिंह और उनके साथी पर टोल कर्मचारियों ने हमला कर दिया। यह घटना सिर्फ एक उदाहरण है, ऐसे कई मामले सामने आते रहे हैं जिनमें नागरिकों को टोल कर्मियों द्वारा मारपीट, धमकी या गंभीर चोटें दी गई हैं। देश के नागरिकों की सुरक्षा का जिम्मा सरकार का है, लेकिन जमीनी स्तर पर ऐसी घटनाओं में कार्रवाई का अभाव साफ दिखता है।इस घटना के बाद राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने टोल एजेंसी M/s Dharam Singh पर 20 लाख रुपये का जुर्माना लगाया और उसके लाइसेंस को भी रद्द करने की प्रक्रिया शुरू की। छह कर्मचारियों को पुलिस ने गिरफ्तार किया। हालांकि NHAI ने बयान जारी करके ऐसी हरकतों की निंदा की और भविष्य में टोल एजेंसी को ब्लैकलिस्ट करने की बात कही, मगर यह प्रतिक्रिया काफी देर बाद आई और आखिरकार वही ‘सूट-बूट’ वाली औपचारिकता रही।

यही वह जगह है जहाँ राज्य सरकारों को आगे आना चाहिए। अब समय आ गया है कि राज्य सरकारें यह सुनिश्चित करें कि हर टोल प्लाज़ा पर पुलिस की मौजूदगी हो और यात्रियों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। जो लोग अपराध की सीमा पार कर यात्रियों पर हमला करते हैं, उन्हें तुरंत गिरफ़्तार कर कड़ी से कड़ी सज़ा दी जानी चाहिए। साथ ही, उन प्रभावशाली लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए जो ऐसे अपराधियों को संरक्षण देते हैं और जिनकी वजह से पुलिस कार्रवाई का भय समाप्त हो चुका है। यदि यह चक्र नहीं तोड़ा गया तो जनता का विश्वास कानून-व्यवस्था से पूरी तरह उठ जाएगा।

राजनैतिक संरक्षण और अपराध

कई बार ये टोल एजेंसियां स्थानीय नेताओं और अधिकारी वर्ग की मिलीभगत से चलती हैं। अपराधी मानसिकता वाले लोगों को स्थानीय संरक्षण मिलता है, जिससे प्रशासन में उनके खिलाफ कार्रवाई करने का हौसला नहीं रहता। इस माहौल में अपराधियों में पुलिस या कानून का भय नहीं रहा। यदि सरकार अपराधियों को संरक्षण देती है या उन पर सख्त कार्रवाई नहीं होती तो जनता का भरोसा प्रशासन और सरकार से उठ जाएगा।

“जुमला” बनता जन सुरक्षा का दावा

बीजेपी सरकार सदैव जन सुरक्षा को लेकर बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन जब आम नागरिक को टोल पर पीटा जाता है तो वही सरकार खामोश नजर आती है। VIP सुरक्षा के दोहरे मानदंड आम लोगों के लिए जिल्लत और सरकार के खोखले वादों का प्रमाण हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री को फौरन सुरक्षा मिल जाती है, नेताओं को Z+ मिलती है, लेकिन आम जनता को कहीं सुनवाई नहीं है। यह लोकतंत्र के साथ धोखा है और भाजपा सरकार की नीयत पर सवाल उठाता है।

सबसे बड़ा सवाल यहाँ सरकार के दोहरे मानदंडों का है। जब किसी राजनेता या मुख्यमंत्री पर हमला होता है, तो तत्काल उनकी सुरक्षा बढ़ा दी जाती है। हाल ही में दिल्ली के मुख्यमंत्री पर हमले के बाद तुरंत उन्हें CRPF की ज़ेड-श्रेणी की सुरक्षा प्रदान की गई जिसमें लगभग 20 जवान तैनात कर दिए गए। लेकिन आम नागरिक जब टोल प्लाज़ा पर पीटे जाते हैं, घायल होते हैं, यहाँ तक कि मौत तक हो जाती है, तब किसी की सुनवाई नहीं होती। क्या यह देश केवल नेताओं की सुरक्षा के लिए है और आम जनता को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है?

भाजपा सरकार बार-बार जनता से यह वादा करती रही है कि “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” उसकी नीति है। लेकिन टोल घटनाओं जैसी स्थितियाँ बताती हैं कि यह नारा केवल “जुमला” बनकर रह गया है। अगर सच में सरकार जनता की सुरक्षा के प्रति गंभीर है तो उसे तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए, NHAI और उसकी एजेंसियों को ज़िम्मेदार ठहराना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि टोल प्लाज़ा पर कोई भी आम नागरिक दुर्व्यवहार या हिंसा का शिकार न बने।

जनता का विश्वास तभी कायम रहेगा जब सरकार अपने वादों को धरातल पर उतारेगी। यह सवाल केवल सुरक्षा का ही नहीं बल्कि समानता का भी है। अगर नेता को हमला होते ही सुरक्षा दी जा सकती है, तो आम जनता को भी उसी स्तर पर सुरक्षा क्यों नहीं मिल सकती? आखिर सड़क पर यात्रा करने वाला एक साधारण नागरिक भी इस देश का उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा है जितना कोई मंत्री या मुख्यमंत्री। कानून की नज़र में सब बराबर हैं, तो फिर व्यवहार में यह असमानता क्यों?

समाज और लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताक़त उसकी जनता है। अगर जनता ही असुरक्षित महसूस करेगी, तो यह सरकार की सबसे बड़ी नाकामी होगी। अब समय आ गया है कि केंद्र और राज्य सरकारें इस मुद्दे पर गंभीरता दिखाएँ, दोहरे मापदंड छोड़ें और यह साबित करें कि यह देश केवल नेताओं के लिए नहीं बल्कि हर नागरिक के लिए समान रूप से सुरक्षित है।

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