कैबिनेट ने इंडस्ट्रियल ग्रोथ और ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस को बढ़ावा देने के लिए औद्योगिक लाइसेंसिंग नीति-2015 में संशोधन को मंज़ूरी दी

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हरियाणा के मुख्यमंत्री श्री नायब सिंह सैनी की अध्यक्षता में आज यहां हुई कैबिनेट की बैठक में 01.10.2015 की औद्योगिक लाइसेंसिंग नीति में ज़रूरी बदलावों को मंज़ूरी दी गई। इसका उदेश्य रेगुलेटरी नियमों को सही बनाना, डेवलपर्स पर पैसे का बोझ कम करना और पूरे राज्य में नियोजित औद्योगिक विकास को बढ़ावा देना है।

ये बदलाव इंडस्ट्री की लंबे समय से चली आ रही मांगों के जवाब में लाए गए हैं, जिसमें NAREDCO  जैसे हितधारकों से प्रतिनिधित्व भी शामिल हैं, और इनका उदेश्य टेक्सटाइल नीति जैसी दूसरी सेक्टर की नीति में लिए गए फैसलों के साथ स्पष्टता, स्थिरता और समता लाना है।

कैबिनेट का एक अहम फैसला एग्रीकल्चर ज़ोन में बाह्य विकास शुल्क (ईडीसी) को रेशनलाइजेशन करने से जुड़ा है। यह मंज़ूरी दी गई है कि जिन मामलों में शहरी सीमा के 500 मीटर से ज्यादा के एग्रीकल्चर ज़ोन में इंडस्ट्रियल लाइसेंस दिया गया है, और जहाँ कंप्लीशन या पार्ट कंप्लीशन सर्टिफिकेट पहले ही जारी किया जा चुका है, अगर ऐसी ज़मीन बाद में शहरी ज़ोन में या उसके 500 मीटर के अंदर शामिल हो जाती है, तो कोई ईडीसी नहीं देना होगा। लेकिन, ऐसी लाइसेंस वाली ज़मीन के बाकी अधूरे हिस्से के लिए, अर्बनाइज़ेबल ज़ोन में इंडस्ट्रियल कॉलोनियों के लिए मौजूदा नियमों के हिसाब से ईडीसी लागू होगा। इसके अलावा, ऐसे मामलों में जहां कोई डेवलपर पहले से बने या आधे-अधूरे एरिया के लिए खास इंफ्रास्ट्रक्चर सुविधाएं चाहता है, तो संबंधित सरकारी एजेंसियों द्वारा दिए गए ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर की असली कीमत ही ली जाएगी।

कैबिनेट ने परिवहन और संचार क्षेत्र में ज़मीन का ज्यादा अच्छे से इस्तेमाल करने के लिए बदलावों को भी मंज़ूरी दी। मौजूदा इंडस्ट्रियल लाइसेंसिंग पॉलिसी को 19.03.2021 की चेंज ऑफ़ लैंड यूज़ (सीएलयू) पॉलिसी के साथ जोड़ा गया है, जिससे परिवहन और संचार क्षेत्र में इंडस्ट्रियल यूनिट्स को इजाज़त मिल सके, जिससे लाइसेंसिंग और सीएलयू सिस्टम के बीच बराबरी पक्की हो सके। बदले हुए नियमों के तहत, अब प्रकाशित अंतिम विकास योजना के परिवहन और संचार क्षेत्र में इंडस्ट्रियल कॉलोनी बनाने की इजाज़त के साथ-साथ सीएलयू की इजाज़त भी दी जाएगी। यह इजाज़त ऐसे ज़ोन के कुल नेट प्लान्ड एरिया के 25 प्रतिशत तक होगी, ताकि कॉम्पैक्ट डेवलपमेंट के ज़रिए ज़मीन का बेहतर इस्तेमाल हो सके।

यह बदलाव ऐसे नियमों को हाइपर पोटेंशियल और हाई पोटेंशियल वाले शहरों पर भी लागू करता है, जो पहले कवर नहीं थे, इस तरह तेज़ी से बढ़ते शहरी सेंटर्स में इंडस्ट्रियल मौके बढ़ेंगे।

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