भारतीय किसान यूनियन (मान) ने देश में एथेनॉल आधारित कृषि अर्थव्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाने की आवश्यकता पर बल देते हुए केंद्र सरकार से किसानों को एथेनॉल उद्योग से सीधे जोड़ने की मांग की है। संगठन का कहना है कि यदि गन्ना, मक्का, धान, पराली और अन्य कृषि उत्पादों से बनने वाले एथेनॉल की खरीद सीधे किसानों से की जाए, तो इससे किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि होगी और कृषि क्षेत्र को एक नया आर्थिक आधार मिलेगा।
भाकियू (मान) के प्रदेशाध्यक्ष ठाकुर गुणीप्रकाश ने जारी एक प्रेस बयान में कहा कि एथेनॉल केवल एक वैकल्पिक ईंधन नहीं, बल्कि किसानों की आर्थिक समृद्धि का प्रभावी माध्यम बन सकता है। उन्होंने कहा कि इस सोच की नींव वर्ष 2008 में किसान नेता और भारतीय किसान आंदोलन के प्रमुख विचारकों में शामिल स्वर्गीय शरद जोशी ने रखी थी। उन्होंने उस समय मांग उठाई थी कि गन्ने के साथ-साथ मक्का, चावल, पराली और अन्य कृषि उत्पादों से तैयार एथेनॉल के उत्पादन और उपयोग को व्यापक स्तर पर अनुमति दी जाए, ताकि किसानों को अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिल सके और उनकी आय के नए स्रोत विकसित हों।
ठाकुर गुणीप्रकाश ने कहा कि आज जब भारत ऊर्जा सुरक्षा और हरित ईंधन की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है, तब किसानों को इस परिवर्तन का सबसे बड़ा भागीदार बनाया जाना चाहिए। उन्होंने मांग की कि एथेनॉल उत्पादन करने वाली कंपनियों को किसानों से सीधे खरीद की व्यवस्था करने की अनुमति दी जाए। इससे बिचौलियों की भूमिका समाप्त होगी, किसानों को उचित मूल्य मिलेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
उन्होंने कहा कि एथेनॉल एक कार्बनिक यौगिक है, जिसका उपयोग लंबे समय से विभिन्न उद्देश्यों के लिए किया जाता रहा है। समय के साथ यह स्वच्छ और नवीकरणीय ईंधन के रूप में विश्वभर में अपनी मजबूत पहचान बना चुका है। वैश्विक स्तर पर भी एथेनॉल का इतिहास काफी पुराना है। वर्ष 1908 में हेनरी फोर्ड द्वारा विकसित ‘मॉडल टी’ कार को पेट्रोल और एथेनॉल दोनों पर चलने योग्य बनाया गया था। इसके बाद 1931 में ब्राजील दुनिया का पहला ऐसा देश बना जिसने अपनी गैसोलीन में एथेनॉल मिश्रण की शुरुआत की। वर्ष 1970 के दशक के वैश्विक ऊर्जा संकट के बाद एथेनॉल को पर्यावरण अनुकूल ईंधन के रूप में व्यापक स्वीकृति मिली।
भारत में एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि वर्ष 2001 में पायलट परियोजना के रूप में इसकी शुरुआत हुई थी, जबकि 2003 में केंद्र सरकार ने इसे औपचारिक रूप से लागू किया। वर्तमान में भारत सरकार पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण (ई-20) का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रही है, जिससे पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिल रहा है।
भाकियू (मान) का मानना है कि एथेनॉल नीति को केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि इसे किसानों की आर्थिक उन्नति से जोड़कर देखा जाना चाहिए। संगठन के अनुसार यदि कृषि अवशेष, पराली और अन्य फसलों का उपयोग एथेनॉल उत्पादन में बड़े पैमाने पर होने लगे तो किसानों को अतिरिक्त आय मिलेगी, पराली जलाने जैसी समस्या में कमी आएगी और पर्यावरण संरक्षण को भी मजबूती मिलेगी।
ठाकुर गुणीप्रकाश ने कहा कि देश के किसानों को पारंपरिक कृषि के साथ-साथ ऊर्जा उत्पादन की इस नई अर्थव्यवस्था का भी हिस्सा बनाया जाना चाहिए। उन्होंने केंद्र सरकार से ऐसी नीतियां बनाने की मांग की, जिनके माध्यम से किसान सीधे एथेनॉल उद्योग से जुड़ सकें और उन्हें उनकी उपज का लाभकारी मूल्य सुनिश्चित हो।
उन्होंने कहा कि भारत के लिए एथेनॉल केवल एक वैकल्पिक ईंधन नहीं, बल्कि कृषि, ऊर्जा और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित करने वाला एक महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है। यदि इस दिशा में किसान-केंद्रित नीतियां बनाई जाती हैं, तो इससे न केवल किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी, बल्कि देश की ऊर्जा आत्मनिर्भरता और ग्रामीण विकास को भी नई गति मिलेगी।
