सुंदरनगर में भू-स्खलन से त्रासदी: ब्रगटा गांव में तीन की मौत, आठ माह के मासूम संग दो महिलाएं दबकर गईं, प्रशासन पर उठे सवाल

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मंडी ज़िले के सुंदरनगर उपमंडल की निहरी तहसील के ब्रगटा गांव में बीती रात आई भयावह आपदा ने पूरे क्षेत्र को शोकाकुल कर दिया। गांव के एक घर के पास भूस्खलन हुआ और देखते ही देखते पूरा मकान मलबे में समा गया। घर में उस समय पाँच लोग मौजूद थे, जिनमें से तीन की मौत हो गई, जबकि दो को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। इस दर्दनाक हादसे ने न सिर्फ़ स्थानीय परिवारों को बल्कि पूरे इलाके को गहरे सदमे में डाल दिया है।

हादसे में जान गंवाने वालों में 64 वर्षीय तांगू देवी, 33 वर्षीय कमला देवी और मात्र आठ महीने का मासूम भीष्म सिंह शामिल हैं। बचाए गए लोगों में 65 वर्षीय खुबराम और 58 वर्षीय दर्शन देवी हैं, जिन्हें ग्रामीणों और बचाव दलों की मदद से मलबे से निकाला गया। पुलिस ने मृतकों के शवों को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है और औपचारिक जांच प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।

इस भीषण त्रासदी ने सुंदरनगर क्षेत्र को एक बार फिर प्राकृतिक आपदा की भयावहता से रूबरू कराया है। गौरतलब है कि इसी उपमंडल के जंगमबाग क्षेत्र में हाल ही में एक और भूस्खलन हुआ था, जिसमें सात लोगों की जान चली गई थी। लगातार ऐसी घटनाओं ने इलाके में दहशत का माहौल पैदा कर दिया है और यह सवाल उठने लगे हैं कि आखिर कब तक लोग प्रशासन की आश्वासनों पर भरोसा करते रहेंगे जबकि आपदा से बचाव और स्थायी समाधान की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे।

स्थानीय लोगों का कहना है कि भू-स्खलन की घटनाएं अब लगातार आम हो चुकी हैं, लेकिन प्रशासन की ओर से न तो सुरक्षित पुनर्वास की कोई योजना बनी है और न ही संवेदनशील क्षेत्रों में वैज्ञानिक दृष्टि से घर बनाने की दिशा में मार्गदर्शन दिया जा रहा है। पहाड़ी इलाकों में बेतरतीब निर्माण और बारिश से कमजोर हुई मिट्टी ऐसी घटनाओं को और भी घातक बना रही है। ग्रामीणों ने दुख और आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा कि जब तक ठोस नीति नहीं बनेगी, तब तक हर बारिश उनके लिए मौत का साया लेकर आएगी।

एसपी मंडी साक्षी वर्मा ने घटना की पुष्टि करते हुए बताया कि राहत और बचाव कार्य तुरंत शुरू किया गया था और दो लोगों की जान बचाई जा सकी। वहीं एसडीएम सुंदरनगर अमर नेगी और डीएसपी भारत भूषण समेत प्रशासनिक अधिकारी मौके पर पहुंचे हैं और प्रभावित परिवार को हर संभव मदद का आश्वासन दिया है। हालांकि, पीड़ित परिवारों और ग्रामीणों का कहना है कि हर बार केवल मुआवज़े और औपचारिक घोषणाओं तक ही बातें सीमित रह जाती हैं।

यह हादसा एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करता है कि हिमाचल प्रदेश जैसे भूकंपीय और भूस्खलन प्रभावित राज्य में आपदा प्रबंधन और भू-सुरक्षा पर कितनी गंभीरता से काम किया जा रहा है। राज्य सरकार भले ही कहती हो कि वह संवेदनशील इलाकों में लोगों को सुरक्षित स्थानों पर बसाने की योजना बना रही है, लेकिन वास्तविकता यह है कि ऐसी योजनाएँ अक्सर कागज़ों से आगे नहीं बढ़ पातीं।

ब्रगटा गांव की यह त्रासदी सिर्फ़ तीन जिंदगियों के खोने की कहानी नहीं है, बल्कि यह सवाल भी है कि क्या हम आपदाओं के साथ जीने के लिए मजबूर हो चुके हैं? क्या प्रशासन और सरकारें तब तक सक्रिय नहीं होंगी जब तक किसी परिवार के आंगन में चीखें गूँज न उठें? अब वक्त आ गया है कि राज्य और केंद्र सरकार मिलकर संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करें, वहाँ स्थायी पुनर्वास की नीति बनाएँ और लोगों को सुरक्षित भविष्य देने की गारंटी करें।

यह घटना हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी समाज की असुरक्षा को उजागर करती है। हर साल होने वाली ऐसी प्राकृतिक त्रासदियाँ सिर्फ़ आंकड़ों का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि उन परिवारों की अनंत पीड़ा की याद दिलाती हैं जो अपने प्रियजनों को खोकर हमेशा के लिए टूट जाते हैं। ब्रगटा की इस दुर्घटना ने एक बार फिर चेतावनी दी है कि अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में पहाड़ों की गोद में बसे गांवों के लिए जीवन और भी असुरक्षित हो जाएगा।

यह एक वेब जनित समाचार रिपोर्ट है।

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