हरियाणा में प्रशासनिक अहंकार बनाम जनप्रतिनिधित्व: पानीपत शराब ठेका विवाद ने खोली सिस्टम की परतें

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हरियाणा के पानीपत में भाजपा विधायक प्रमोद विज और उप आबकारी एवं कराधान आयुक्त (DETC) बिजेंद्र ढुल के बीच हुआ तीखा संवाद अब प्रदेश की प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है। यह विवाद एक निर्माणाधीन रेलवे अंडरपास के समीप खोले जा रहे शराब ठेके को लेकर है, जो शहर के आजाद नगर, राजनगर और संजय कॉलोनी के निवासियों के अनुसार मंदिर, स्कूल और सत्संग भवन जैसे संवेदनशील स्थलों के मात्र 50 मीटर के दायरे में आ रहा है। स्थानीय लोगों की शिकायत है कि इस ठेके की स्थापना सामाजिक और नैतिक दृष्टि से आपत्तिजनक है, लेकिन उनकी आवाज़ अनसुनी रह गई, जिसके बाद वे अपनी व्यथा लेकर विधायक प्रमोद विज के पास पहुंचे।

विधायक ने तत्काल स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए DETC बिजेंद्र ढुल को फोन कर मामला स्पष्ट किया। बातचीत के दौरान विधायक बार-बार अधिकारी से निवेदन करते दिखे—वह ‘सॉरी’ और ‘प्लीज़’ जैसे शब्दों का प्रयोग कर संवाद को शांतिपूर्ण ढंग से हल करने की कोशिश करते रहे, लेकिन अधिकारी अपनी ही बात पर अड़े रहे। उन्होंने यह तर्क दिया कि ठेका नियमों के तहत सही स्थान पर खोला गया है, जबकि विधायक मौके पर जाकर देखने के बाद यह स्पष्ट कर रहे थे कि जिस स्थान पर ठेका खोला गया है, वह आजाद नगर है, जबकि लाइसेंस राजनगर के नाम पर है।

इस तीन मिनट की वायरल वीडियो क्लिप में न सिर्फ विधायक की जनसरोकार के प्रति संवेदनशीलता नजर आती है, बल्कि यह भी उजागर होता है कि प्रशासनिक अधिकारी, जनप्रतिनिधि की बात सुनने को तैयार नहीं हैं। विधायक का यह कहना कि “आप मेरी बात नहीं सुन रहे, मेरी जनता की बात नहीं सुन रहे, तो समाधान कैसे होगा” इस संवाद की असल पीड़ा को उजागर करता है। जब अधिकारी ने एक मंत्री का हवाला दिया, तब विधायक ने दो टूक कहा कि “उनकी चिंता मत कीजिए, मैं स्वयं उनसे बात करूंगा।” लेकिन जब कोई समाधान न निकलता दिखा, तो उन्होंने अंततः कहा कि अब यह मामला मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के संज्ञान में लाया जाएगा और गुस्से में फोन काट दिया।

यह संपूर्ण प्रकरण बताता है कि जब जनता की बात लेकर चुना हुआ प्रतिनिधि सामने आता है और अधिकारी उस पर भी ध्यान नहीं देता, तो यह सिर्फ एक विवाद नहीं, बल्कि व्यवस्था के भीतर मौजूद संवादहीनता और संवेदनहीनता का संकेत है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी बार-बार सिस्टम को जवाबदेह और पारदर्शी बनाने की बात करते हैं, लेकिन यह मामला बताता है कि प्रशासनिक स्तर पर अब भी वही पुरानी ज़िद और शक्ति का केंद्रीकरण कायम है। अगर ऐसे मामलों में मुख्यमंत्री द्वारा कठोर और पारदर्शी कदम नहीं उठाए गए, तो यह न केवल जनप्रतिनिधियों की भूमिका को कमजोर करेगा बल्कि जनता के विश्वास को भी डगमगाएगा।

वक्त की मांग है कि इस घटना को एक चेतावनी के रूप में लिया जाए। यह घटना किसी एक विधायक या एक अधिकारी तक सीमित नहीं, बल्कि एक ऐसे प्रशासनिक तंत्र की तस्वीर है, जो यदि समय रहते नहीं सुधरा, तो राज्य सरकार के नियंत्रण से बाहर होता जाएगा। हरियाणा के वर्तमान मुख्यमंत्री के लिए यह एक अवसर भी है कि वे दिखा सकें कि जनहित में वह न सिर्फ निर्णय लेने में सक्षम हैं, बल्कि उसे लागू करवाने के लिए प्रशासनिक मशीनरी को भी उत्तरदायी बना सकते हैं।

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