21 दिन की फरलो पर फिर जेल से बाहर राम रहीम, 2017 के बाद 17वीं अस्थायी रिहाई; बार-बार मिल रही राहत पर फिर उठे सवाल

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डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह एक बार फिर जेल से बाहर है। रोहतक की सुनारिया जेल में सजा काट रहे राम रहीम को 21 दिन की फरलो मंजूर हुई है और मंगलवार, 25 अगस्त की सुबह करीब 6:05 बजे वह कड़ी सुरक्षा के बीच जेल से बाहर निकला। इसके साथ ही 2017 में सजा सुनाए जाने के बाद यह 17वीं बार है जब वह पैरोल या फरलो के जरिए जेल से बाहर आया है। इस बार उसे सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा मुख्यालय में रहने की अनुमति दी गई है।

जेल से निकलने के बाद राम रहीम का काफिला सिरसा के लिए रवाना हुआ। उसकी रिहाई के दौरान सुनारिया जेल के बाहर सुरक्षा के विशेष इंतजाम किए गए थे। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक वह सुबह करीब आठ बजे सिरसा पहुंचा। इस दौरान उसके काफिले में कई वाहन शामिल रहे, जिनमें अलग-अलग तरह की गाड़ियां दिखाई दीं। जेल से बाहर निकलने का दृश्य एक बार फिर इसलिए चर्चा में आया क्योंकि राम रहीम की अस्थायी रिहाइयों का सिलसिला अब एक नियमित पैटर्न की तरह दिखाई देने लगा है।

राम रहीम की इस ताजा फरलो ने उसकी बार-बार होने वाली अस्थायी रिहाई को लेकर पुरानी बहस को भी फिर सामने ला दिया है। 2017 में दोषी ठहराए जाने के बाद से वह अब तक 17 बार जेल से बाहर आ चुका है। इस साल ही यह तीसरी ऐसी रिहाई है। जनवरी में उसे 40 दिन की पैरोल मिली थी, जबकि मई में 30 दिन की पैरोल दी गई। पिछली 30 दिन की पैरोल पूरी करने के बाद वह 26 जून को सुनारिया जेल वापस लौटा था। अब करीब दो महीने बाद वह फिर 21 दिन के लिए जेल से बाहर है।

यहां पैरोल और फरलो के बीच अंतर भी महत्वपूर्ण है। दोनों ही मामलों में कैदी को निर्धारित शर्तों के तहत अस्थायी रूप से जेल से बाहर आने की अनुमति मिलती है, लेकिन उनके कानूनी आधार और परिस्थितियां अलग होती हैं। राम रहीम की मौजूदा रिहाई फरलो के तौर पर हुई है। उसकी लगातार अस्थायी रिहाइयों ने पहले भी यह सवाल खड़ा किया है कि जेल में सजा काट रहे एक अत्यधिक चर्चित और प्रभावशाली कैदी को इतनी बार अस्थायी राहत मिलने की प्रक्रिया किस तरह काम करती है।

राम रहीम को अगस्त 2017 में पंचकूला की विशेष सीबीआई अदालत ने दो महिला अनुयायियों के साथ दुष्कर्म के मामलों में दोषी ठहराया था। दोनों मामलों में उसे 10-10 वर्ष की सजा सुनाई गई, जो लगातार चलने वाली सजाएं हैं और इस तरह कुल 20 वर्ष की सजा बनी। वह पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या के मामले में भी दोषी ठहराया जा चुका है।

राम रहीम की रिहाइयों को लेकर विवाद केवल उनकी संख्या तक सीमित नहीं रहा है। उनकी कई अस्थायी रिहाइयों का समय भी सार्वजनिक चर्चा का विषय रहा है। समर्थकों के लिए ये रिहाइयां कानूनी प्रक्रिया के तहत मिली राहत हैं, जबकि आलोचक बार-बार सवाल उठाते रहे हैं कि क्या इतने कम अंतराल में बार-बार अस्थायी रिहाई का फैसला सामान्य कैदियों के लिए लागू व्यवस्था के व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

इस बार की रिहाई में एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि राम रहीम को सिरसा स्थित डेरा मुख्यालय में रहने की अनुमति दी गई है। इसका अर्थ है कि फरलो की अवधि के दौरान उसकी गतिविधियां उस स्थान से जुड़ी रहेंगी, जहां डेरा सच्चा सौदा का प्रमुख संस्थागत आधार मौजूद है। ऐसे में उसकी अस्थायी रिहाई का प्रभाव केवल जेल प्रशासन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि डेरा अनुयायियों और व्यापक राजनीतिक-सामाजिक विमर्श में भी इसकी गूंज सुनाई देती है।

हालांकि, फरलो मिलना अपने आप में दोषसिद्धि या सजा को खत्म नहीं करता। यह एक अस्थायी रिहाई है, जिसके दौरान संबंधित कैदी को निर्धारित शर्तों का पालन करना होता है और अवधि समाप्त होने पर उसे जेल लौटना होता है। राम रहीम की मौजूदा फरलो भी इसी अस्थायी प्रकृति की है।

राम रहीम की लगातार रिहाइयों ने हरियाणा में जेल प्रशासन, कैदी अधिकारों और अस्थायी रिहाई की व्यवस्था पर बहस को लगातार जीवित रखा है। एक तरफ जेल सुधारों में कैदियों को निर्धारित परिस्थितियों में परिवार और सामाजिक जीवन से अस्थायी रूप से जुड़ने का अवसर देने की व्यवस्था मौजूद है, दूसरी तरफ हाई-प्रोफाइल कैदियों के मामलों में पारदर्शिता और समानता का सवाल अधिक तीखे ढंग से सामने आता है।

25 अगस्त की सुबह सुनारिया जेल से निकले राम रहीम के साथ सुरक्षा व्यवस्था भी इसी संवेदनशीलता को दर्शाती रही। उसकी रिहाई का हर चरण सार्वजनिक निगाहों में रहा—जेल से निकलना, काफिले के साथ रवाना होना और सिरसा पहुंचना। नौ वर्षों में 17वीं अस्थायी रिहाई का आंकड़ा अपने आप में इस मामले को सामान्य जेल प्रशासन की खबर से आगे ले जाता है।

अब 21 दिनों तक राम रहीम सिरसा स्थित डेरा मुख्यालय में रहेगा। इस अवधि के दौरान उसकी गतिविधियों और फरलो की शर्तों के पालन पर स्वाभाविक रूप से निगाह रहेगी। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का बड़ा सवाल यही है कि एक ऐसे व्यक्ति, जिसे गंभीर आपराधिक मामलों में लंबी सजा मिली हुई है, की बार-बार होने वाली अस्थायी रिहाइयों को लेकर उठने वाले सवालों का जवाब व्यवस्था किस तरह देती है।

राम रहीम की कहानी इसलिए भी असाधारण है क्योंकि 2017 की दोषसिद्धि के बाद जेल जीवन और अस्थायी रिहाई के बीच उसका सार्वजनिक जीवन लगातार सुर्खियों में बना रहा है। हर नई फरलो के साथ बहस फिर लौटती है—कानून के तहत उपलब्ध राहत और उसके सामाजिक प्रभाव के बीच संतुलन कहां होना चाहिए। 21 दिन की यह ताजा फरलो उस बहस को एक बार फिर हरियाणा की राजनीति, प्रशासन और समाज के केंद्र में ले आई है।

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