UPI की नई फीस व्यवस्था से बढ़ी चिंता: क्या दुकानदार बढ़ी लागत ग्राहकों से वसूलेंगे?

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भारत में वर्षों से लगभग मुफ्त डिजिटल भुगतान की पहचान बन चुके Unified Payments Interface यानी UPI को लेकर सरकार के नए Merchant Discount Rate (MDR) ढांचे ने एक बड़ा राजनीतिक और आर्थिक विवाद खड़ा कर दिया है। कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार पर आरोप लगाया है कि उसने अमेरिकी दबाव के आगे झुकते हुए UPI के बड़े कारोबारी लेन-देन पर शुल्क लगाने का रास्ता खोला है। सरकार का कहना है कि यह उपभोक्ताओं पर कोई शुल्क नहीं है और इसका उद्देश्य दुनिया के सबसे बड़े रियल-टाइम भुगतान नेटवर्क में निवेश को टिकाऊ बनाना है।

15 अक्टूबर से लागू होने वाली नई व्यवस्था के तहत ₹2,000 से अधिक के चुनिंदा person-to-merchant UPI भुगतान पर 0.4 प्रतिशत MDR लगाया जाएगा। ₹75,000 या उससे अधिक के सामान्य लेन-देन पर यह शुल्क अधिकतम ₹300 होगा। हालांकि व्यक्ति से व्यक्ति यानी P2P भुगतान पूरी तरह मुफ्त रहेगा और ₹2,000 तक के merchant payments पर भी MDR नहीं लगेगा। सरकार के अनुसार लगभग 96 प्रतिशत merchant transactions इस बदलाव से प्रभावित नहीं होंगे।

यही वह बिंदु है जिस पर राजनीतिक विवाद सबसे अधिक तीखा हो गया है।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि मोदी सरकार ने अमेरिकी दबाव के आगे एक बार फिर समझौता किया है। उन्होंने कहा कि बड़े UPI भुगतानों पर शुल्क लगाने की व्यवस्था अंततः व्यापारियों के माध्यम से आम उपभोक्ताओं पर बोझ डाल सकती है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने इससे भी आगे बढ़कर सवाल किया कि क्या यह कदम अमेरिकी कार्ड कंपनियों को UPI के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए बेहतर स्थिति देने के उद्देश्य से उठाया गया है। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधते हुए इसे “Narendra’s Ongoing Trump Appeasement” कहा।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी इस फैसले को लेकर सवाल उठाए हैं और विपक्ष ने इसे आम जनता तथा छोटे कारोबारियों के लिए चिंता का विषय बताया है। कांग्रेस का तर्क है कि UPI की सबसे बड़ी ताकत उसकी सरलता और कम लागत रही है और शुल्क की व्यवस्था धीरे-धीरे इस मॉडल को बदल सकती है।

लेकिन सरकार इस राजनीतिक व्याख्या को स्वीकार नहीं करती।

वित्त मंत्रालय का कहना है कि MDR न तो कोई सरकारी टैक्स है और न ही ऐसा शुल्क जिसे सरकार अपने खाते में जमा करेगी। यह भुगतान व्यवस्था में शामिल बैंकों, payment service providers और UPI applications के बीच वितरित किया जाएगा। सरकार के अनुसार इसका उद्देश्य UPI के संचालन, साइबर सुरक्षा, तकनीकी ढांचे और भविष्य के विस्तार के लिए आर्थिक आधार तैयार करना है।

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि बैंक और UPI application providers ग्राहकों से यह MDR अलग से वसूल नहीं सकते। छोटे कारोबारियों को भी सुरक्षा दी गई है। UPI QR के माध्यम से महीने में ₹1 लाख तक प्राप्त करने वाले छोटे व्यापारियों को zero-MDR व्यवस्था में रखा गया है। रेलवे, दूरसंचार, बीमा, ईंधन और कृषि इनपुट जैसे कुछ क्षेत्रों के लिए ₹2,000 से अधिक के लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत के बजाय ₹5 का flat MDR रखा गया है।

फिर भी सवाल यह है कि इसका अंतिम आर्थिक बोझ किस पर पड़ेगा।

सरकार की मौजूदा व्यवस्था के अनुसार ग्राहक से MDR वसूलना प्रतिबंधित है। लेकिन कारोबारियों के लिए भुगतान स्वीकार करने की लागत बढ़ने की स्थिति में वे अपने व्यापारिक खर्चों को दूसरी जगह समायोजित कर सकते हैं। यह जरूरी नहीं कि हर व्यापारी कीमत बढ़ाए, लेकिन बड़े कारोबारों के लिए payment-processing cost अब एक नया खर्च बन सकती है। यही वह संभावना है जिसे कांग्रेस राजनीतिक मुद्दा बना रही है।

भारत का UPI नेटवर्क अब इतना बड़ा हो चुका है कि इसकी अर्थव्यवस्था में मामूली बदलाव भी व्यापक असर डाल सकते हैं। अगस्त 2026 में UPI ने लगभग 24 अरब transactions किए, जिनका कुल मूल्य करीब $311 billion था। PhonePe और Google Pay जैसे प्लेटफॉर्म इस व्यवस्था में बड़े खिलाड़ी हैं।

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